Showing posts with label Posts in Hindi. Show all posts
Showing posts with label Posts in Hindi. Show all posts

Friday, April 9, 2010

 



 





वह शक्ति हमें दो दयानिधे,
                            कर्तव्य मार्ग पर डट जावें |
पर सेवा पर उपकार में हम,
                            निज जीवन सफल बना जावें ||
हम दीन दुखी निबलों विकलों
                            के सेवक बन सन्ताप हरें |
जो हों भूले भटके बिछुड़े
                            उनको तारें ख़ुद तर जावें ||
छल-द्वेष-दम्भ-पाखण्ड- झूठ,
                            अन्याय से निशदिन दूर रहें |
जीवन हो शुद्ध सरल अपना
                            शुचि प्रेम सुधारस बरसावें ||
निज आन मान मर्यादा का
                            प्रभु ध्यान रहे अभिमान रहे |
जिस देश जाति में जन्म लिया
                            बलिदान उसी पर हो जावें ||



 


यहाँ से उद्धृत: http://www.sat-karma.com/spr1/read_poem.php?param=poem49&poet=agyaat

Thursday, April 1, 2010

मुन्नी इस्कूल जाएगी . ..!


मै ना जानु पढ़ना लिखना,
लेकिन मुन्नी को हे पढ़ना,
अच्छी शिक्षा पाएगी
जब मुन्नी इस्कूल जाएगी . . .

रोज मजूरी कितनी मिलती,
मै ना जानु कोई गिनती
वो मुझसे गिनवाएगी
जब मुन्नी इस्कूल जाएगी . . .

दूर कभी चिठ्ठी हो देनी
मेरी बात लिखेगी मुन्नी
ख़त मे वो छाजाएगी
जब मुन्नी इस्कूल जाएगी . . .

हर मुश्किल से उसको लढना
कुछ भी हो आगे हे बढ़ना
अच्छे नंबर लाएगी
जब मुन्नी इस्कूल जाएगी . . .

जीवन कटा हे सहेते सहेते
थोडा हसते थोडा रोते
वो गीत खुशीके गाएगी
जब मुन्नी इस्कूल जाएगी . . .

-निखिलेश


श्रोत कड़ी: यार!! कर के तो देखो!!

Friday, March 26, 2010

पृथ्वी घंटा २०१०


कल यानि २७ मार्च शनिवार को समस्त विश्व "पृथ्वी घंटा - २०१०" मानाने की तैयारी में जुटा है, "पृथ्वी घंटा" अभियान २००७ में सिडनी, आस्ट्रेलिया के करीब २२ लाख परिवारों एवं कारोबारिओं द्वारा एक घंटे के लिए बिजली का उपयोग नहीं कर, वातावरण/जलवायु परिवर्तन के जागरूकता स्वरूप अपना रुख अभिव्यक्त करने के लिए शुरू किया गया| भारत देश में यह अभियान फिछले साल २००९ को शुरू किया गया|

पृथ्वी घंटा 27 मार्च शनिवार को रात्री 8:30 से 9:३० तक होता है| जलवायु में तेजी से हो रहे परिवर्तन के के बचाव स्वरूप यह एक वैश्विक ज़ज्बा बन गया है| आप भी इसमें भाग लें और अपने आस-पास के लोगों में भी इसके प्रति जागरूकता फैलाएं, ये न सोचें की, अरे! १ घंटे बिजली बचा के क्या उखड़ जायेगा, बिजली की इतनी चोरी एवं बर्बादी होती है तो इस एक घंटे से कितना बचया जा सकेगा? सोचे बूंद-बूंद से ही सागर बना है, यदि हम विश्व के समस्त लोग एकजुट हो एकसाथ एक ही कार्य को अंजाम दें तो उसका कितना प्रभावशाली असर सामने आएगा! अभी से ही यह इंतजाम कर लें की कल रात्रि ८:३० से ९:३० तक बिजली का इस्तेमाल नहीं करना है और उसके अनुरूप कोई वैकल्पिक इन्तेजाम भी कर लें ताकि ज्यादा परेशानी न होने पाए|

 http://www.rochelleparkdistrict.org/Earth%20Hour.jpg

 

 कड़ी:
 http://www.earthhour.in/home.aspx
http://www.earthhour.in/about-us/overview.aspx

Thursday, November 19, 2009

९०-१० का सिद्धांत


एक बहुत ही महत्वपूर्ण सूत्र है जो जीवन के प्रति एक नया दृष्टिकोण दे सकता है। "90-10 का सिद्धांत" नाम के इस सूत्र के अनुसार हमारे जीवन में जो घटित होता है उसका मात्र 10 प्रतिशत हमारे हाथ में नहीं होता बाकी का 90 प्रतिशत हमारे हाथ में होता है। इसे एक उदाहरण से समझने का प्रयास करते हैं। आप दफ्तर जाने के लिए तैयार हो रहे हैं। नाश्ते की मेज पर आपकी बेटी ने चाय का प्याला आपकी कमीज पर गिरा दिया, आपने गुस्से में उसे एक चपत लगा दी और साथ ही पत्नी को भी डांट पिला दी कि उसने न तो चाय का प्याला ठीक से रखा न ही बेटी को कोई तमीज सिखाई है। गुस्से में भुनभुनाते हुए आप ऊपर गए कपडे बदल कर जब नीचे आए तो देखा कि रोने के कारण बेटी ने नाश्ता पूरा नहीं किया और उसकी स्कूल बस निकल गई। पत्नी को भी दफ्तर जाना था और क्रोध में वो किसी तरह का सहयोग भी नहीं देना चाहती थी इसलिए बच्ची को स्कूल आपको ही छोडना था। गुस्से में आपने उसे स्कूल छोडा तो आपसे इतनी नाराज थी कि पीछे मुडकर भी नहीं देखा। दफ्तर के लिए पहले ही देर हो चुकी थी इसलिए आपने गाडी की गति बढा दी और ट्रेफिक पुलिस के हत्थे चढ गए। पैसे देकर जैसे तैसे दफ्तर पहुंचे तो याद आया कि ब्रीफकेस तो घर ही भूल आए। एक खराब दिन के बाद जब शाम को घर पहुंचे तो पत्नी और बेटी का मूंड खराब था और आपसे बात करने या आपका स्वागत करने में उनकी कोई रूचि नहीं थी।
इसी घटना को दूसरी तरह देखते हैं। बेटी ने कमीज पर चाय गिरा दी। आप हडबडाए परन्तु तुरन्त ही संभलते हुए आपने घबराई हुई बेटी को प्यार से कहा, " कोई बात नहीं आगे से घ्यान रखना। " जल्दी-जल्दी कपडे बदल कर आप नीचे आए तो देखा आपकी बेटी स्कूल बस में चढ रही है और आपको देखते ही उसने हाथ दिया। आप और आपकी पत्नी मुस्कुराते हुए एक साथ काम पर निकले। समय पर दफ्तर पहुंच कर अपने एक खुशनुमा दिन बिताया। घर लौटे तो बेटी और पत्नी ने मुस्कुराते हुए आपका स्वागत किया। इस घटना में जो 10 प्रतिशत आपके हाथ में नहीं था वो है चाय के प्याले का गिरना बाकी का 90 प्रतिशत अर्थात आपकी प्रतिक्रिया आपके हाथ में थी।
ज्योतिष शास्त्र में इस त्वरित प्रतिक्रिया के लिए केतु एवं सूर्य तथा द्वितीय एवं चतुर्थ भाव की महत्वपूर्ण भूमिका है। दूसरा भाव वाणी का है तथा चौथा भाव हमारे विचार या opinion का है। केतु त्वरित परिणामों के लिए जाने जाते हैं। दूसरे भाव में स्थित केतु त्वरित एवं अत्यधिक खरा बोलने के लिए प्रेरित करते हैं। इसी प्रकार इन भावों में सूर्य की उपस्थिति भी समान परिणाम देती है,
जैसे भारत में अंग्रेजी साम्राज्य की नींव मजबूत करने का श्रेय लार्ड कर्जन को जाता है। अपनी जवान के तीखेपन से ही इन्होंने तत्कालीन नवाबों को निरूत्तर कर दिया था और वकालत के क्षेत्र में राम जेठमलानी ने अपने नाम के झण्डे गाडे हैं। यह त्वरित एवं तीखी टिप्पणियों के लिए सदा मशहूर रहे हैं।
ये द्वितीय भाव स्थित केतु की ही कृपा है। उक्त हस्तियों ने अपने-अपने क्षेत्र में पूर्ण निष्ठा से अपने लिए जगह बनाई, अत: इनके professional field में तीखी टिप्पणियों को भी सर माथे लिया गया। साथ ही इनकी टिप्पणियों में इनका अनुभव, अपने क्षेत्र में इनकी पकड सम्मिलित है। इनकी टिप्पणियां उस कडवी गोली की तरह है जो अंतत: फायदा देती हैं परन्तु व्यक्तित्व निर्माण की प्रक्रिया से गुजरते हुए या निजी रिश्तों में त्वरित एवं तीखी प्रतिक्रिया घातक सिद्ध हो सकती है। यद्यपि यह ग्रह प्रदत्त है परन्तु ग्रहों के इस इशारे को समझ कर तथा उनके आशीर्वाद और अपने प्रयास से हम इससे बच सकते हैं। हमारे हाथ में जो 90 प्रतिशत है, उसका सही प्रयोग ही इस प्रतिस्पर्द्धा के युग में हमें संतुलित व्यक्तित्व प्रदान कर सकता है जो हमें दौड में औरों से आगे ले जाएगा।


श्रोत कड़ी:

90-10 का सिद्धांत

Saturday, November 14, 2009

मुंबई समेत पश्चिमी महाराष्ट्र में भूकंप के झटके



शाम को करीब ६:३० बजे टी. वी देख रहा था की अचानक युं लग जैसे पलंग हिलने लगा हो, मैंने चौंकते हुए जोर से पुछा, “मम्मी, दीदी भुकम्प आया क्या? अभी एसा लगा जैसे पलंग हिल रहा था कि जैसे भुकंप आ रहा हो!!!!’ मम्मी ने कहा ’नहीं तो एसे ही लगा होगा, कुछ नहीं हुआ, कभी-कभी ऎसा लगता है’। लेकिन मेरे मन में शंका बनी ही रही की नहीं भुकंप तो जरूर ही आया था, पूरा पलंग दाएं-बाएं हिलने लगा था यह एक या उससे भी कम सेकंड के लिये महसुस हुआ। घर में सभी ने कहा की कुछ नहीं हुआ बस एक शन्का ही हुआ होगा। फिर मैंने भी यही सोचा की हो सकता है की वहम ही हो, कभी कभी हाथ हीलाते या उठते बैठते समय अचानक करंट लगने जैसा महसुस होता है तो शायद वैसा ही कुछ आभास हुआ होगा।

फ़िर करीब ८ बजे समचार में बताया गया कि पश्चिमी महाराष्ट्र में रिएक्टर स्केल पर ४.५ के करीब भुकंप के झटके महसुस किये गये हैं…… हे भगवान, सच में भुकंप हि था!!! मेरे तो जैसे होश ही उड गये, समचार में बताये अनुसार यह हल्का सा झटका था इसमें नुकसान की कोइ बडी खबर कहीं से नहीं आयी है। अनुमान से इसका केन्द्र कोयना बान्ध को बताया जा रहा था। संवाददाता नें कहा की मानव अपनें फ़ायदे के लीये प्रकृती से खिलवड करते हैं जिसका खामियाजा भी मानव को ही झेलना पडता है।

इससे पहले लातुर और भुज में आये भुकंप के दौरान भी मुझे हल्के झटके का आभास हुआ था, तब बहुत ही भयंकर तबाही और त्रासदी झेलनी पडी थी यह तो सभी जानते हैं। ईश्वर कि असीम कृपा रही की इस दफ़ा ऎसा कुछ नहीं हुआ।




अन्य कड़ी:

http://www.breakingnewsonline.net/2009/11/mild-earthquake-hits-mumbai-and-parts.html

Thursday, November 12, 2009

हिन्दी के बारे में विभिन्न महापुरुषों के वचन

हिन्दी के बारे में विभिन्न महापुरुषों के वचन


राष्ट्रभाषा के बिना आजादी बेकार है।
- अवनींद्रकुमार विद्यालंकार।

हिंदी का काम देश का काम है, समूचे राष्ट्रनिर्माण का प्रश्न है। - बाबूराम सक्सेना।

समस्त भारतीय भाषाओं के लिए यदि कोई एक लिपि आवश्यक हो तो वह देवनागरी ही हो सकती है। - (जस्टिस) कृष्णस्वामी अय्यर।

हिंदी का पौधा दक्षिणवालों ने त्याग से सींचा है। - शंकरराव कप्पीकेरी।

अकबर से लेकर औरंगजेब तक मुगलों ने जिस देशभाषा का स्वागत किया वह ब्रजभाषा थी, न कि उर्दू। -रामचंद्र शुक्ल।

राष्ट्रभाषा हिंदी का किसी क्षेत्रीय भाषा से कोई संघर्ष नहीं है। - अनंत गोपाल शेवड़े।

दक्षिण की हिंदी विरोधी नीति वास्तव में दक्षिण की नहीं, बल्कि कुछ अंग्रेजी भक्तों की नीति है। - के.सी. सारंगमठ।

हिंदी ही भारत की राष्ट्रभाषा हो सकती है। - वी. कृष्णस्वामी अय्यर।

राष्ट्रीय एकता की कड़ी हिंदी ही जोड़ सकती है। - बालकृष्ण शर्मा नवीन

विदेशी भाषा का किसी स्वतंत्र राष्ट्र के राजकाज और शिक्षा की भाषा होना सांस्कृतिक दासता है। - वाल्टर चेनिंग।

हिंदी को तुरंत शिक्षा का माध्यम बनाइये। - बेरिस कल्यएव।

अंग्रेजी सर पर ढोना डूब मरने के बराबर है। - सम्पूर्णानंद।

एखन जतोगुलि भाषा भारते प्रचलित आछे ताहार मध्ये भाषा सर्वत्रइ प्रचलित। - केशवचंद्र सेन।

देश को एक सूत्र में बाँधे रखने के लिए एक भाषा की आवश्यकता है। - सेठ गोविंददास।

इस विशाल प्रदेश के हर भाग में शिक्षित-अशिक्षित, नागरिक और ग्रामीण सभी हिंदी को समझते हैं। - राहुल सांकृत्यायन।

समस्त आर्यावर्त या ठेठ हिंदुस्तान की राष्ट्र तथा शिष्ट भाषा हिंदी या हिंदुस्तानी है। -सर जार्ज ग्रियर्सन।

मुस्लिम शासन में हिंदी फारसी के साथ-साथ चलती रही पर कंपनी सरकार ने एक ओर फारसी पर हाथ साफ किया तो दूसरी ओर हिंदी पर। - चंद्रबली पांडेय।

भारत की परंपरागत राष्ट्रभाषा हिंदी है। - नलिनविलोचन शर्मा।

जब से हमने अपनी भाषा का समादर करना छोड़ा तभी से हमारा अपमान और अवनति होने लगी। - (राजा) राधिकारमण प्रसाद सिंह।

यदि पक्षपात की दृष्टि से न देखा जाये तो उर्दू भी हिंदी का ही एक रूप है। - शिवनंदन सहाय।

प्रत्येक नगर प्रत्येक मोहल्ले में और प्रत्येक गाँव में एक पुस्तकालय होने की आवश्यकता है। - (राजा) कीर्त्यानंद सिंह।

अपनी सरलता के कारण हिंदी प्रवासी भाइयों की स्वत: राष्ट्रभाषा हो गई। - भवानीदयाल संन्यासी।

यह कैसे संभव हो सकता है कि अंग्रेजी भाषा समस्त भारत की मातृभाषा के समान हो जाये? - चंद्रशेखर मिश्र।

साहित्य की उन्नति के लिए सभाओं और पुस्तकालयों की अत्यंत आवश्यकता है। - महामहो. पं. सकलनारायण शर्मा।

जो साहित्य केवल स्वप्नलोक की ओर ले जाये, वास्तविक जीवन को उपकृत करने में असमर्थ हो, वह नितांत महत्वहीन है। - (डॉ.) काशीप्रसाद जायसवाल।

भारतीय एकता के लक्ष्य का साधन हिंदी भाषा का प्रचार है। - टी. माधवराव।

हिंदी हिंद की, हिंदियों की भाषा है। - र. रा. दिवाकर।

यह संदेह निर्मूल है कि हिंदीवाले उर्दू का नाश चाहते हैं। - राजेन्द्र प्रसाद।

उर्दू जबान ब्रजभाषा से निकली है। - मुहम्मद हुसैन आजाद

समाज और राष्ट्र की भावनाओं को परिमार्जित करने वाला साहित्य ही सच्चा साहित्य है। - जनार्दनप्रसाद झा द्विज

मजहब को यह मौका न मिलना चाहिए कि वह हमारे साहित्यिक, सामाजिक, सभी क्षेत्रों में टाँग अड़ाए। - राहुल सांकृत्यायन।

शिक्षा के प्रसार के लिए नागरी लिपि का सर्वत्र प्रचार आवश्यक है। - शिवप्रसाद सितारेहिंद।

हमारी हिंदी भाषा का साहित्य किसी भी दूसरी भारतीय भाषा से किसी अंश से कम नहीं है। - (रायबहादुर) रामरणविजय सिंह।

वही भाषा जीवित और जाग्रत रह सकती है जो जनता का ठीक-ठीक प्रतिनिधित्व कर सके। - पीर मुहम्मद मूनिस।

भारतेंदु और द्विवेदी ने हिंदी की जड़ पाताल तक पहँुचा दी है; उसे उखाड़ने का जो दुस्साहस करेगा वह निश्चय ही भूकंपध्वस्त होगा। - शिवपूजन सहाय।

चक्कवै दिली के अथक्क अकबर सोऊ, नरहर पालकी को आपने कँधा करै। - बेनी कवि।

यह निर्विवाद है कि हिंदुओं को उर्दू भाषा से कभी द्वेष नहीं रहा। - ब्रजनंदन दास।

देहात का विरला ही कोई मुसलमान प्रचलित उर्दू भाषा के दस प्रतिशत शब्दों को समझ पाता है। - साँवलिया बिहारीलाल वर्मा।

हिंदी भाषा अपनी अनेक धाराओं के साथ प्रशस्त क्षेत्र में प्रखर गति से प्रकाशित हो रही है। - छविनाथ पांडेय।

देवनागरी ध्वनिशास्त्र की दृष्टि से अत्यंत वैज्ञानिक लिपि है। - रविशंकर शुक्ल।

हमारी नागरी दुनिया की सबसे अधिक वैज्ञानिक लिपि है। - राहुल सांकृत्यायन।

नागरी प्रचार देश उन्नति का द्वार है। - गोपाललाल खत्री।

साहित्य का स्रोत जनता का जीवन है। - गणेशशंकर विद्यार्थी।

अंग्रेजी से भारत की रक्षा नहीं हो सकती। - पं. कृ. पिल्लयार।

उसी दिन मेरा जीवन सफल होगा जिस दिन मैं सारे भारतवासियों के साथ शुद्ध हिंदी में वार्तालाप करूँगा। - शारदाचरण मित्र।

हिंदी के ऊपर आघात पहुँचाना हमारे प्राणधर्म पर आघात पहुँचाना है। - जगन्नाथप्रसाद मिश्र।

हिंदी जाननेवाला व्यक्ति देश के किसी कोने में जाकर अपना काम चला लेता है। - देवव्रत शास्त्री।

हिंदी और नागरी का प्रचार तथा विकास कोई भी रोक नहीं सकता। - गोविन्दवल्लभ पंत।

भारत की सारी प्रांतीय भाषाओं का दर्जा समान है। - रविशंकर शुक्ल।

किसी साहित्य की नकल पर कोई साहित्य तैयार नहीं होता। - सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

हार सरोज हिए है लसै मम ऐसी गुनागरी नागरी होय। - ठाकुर त्रिभुवननाथ सिंह।

भाषा ही से हृदयभाव जाना जाता है। शून्य किंतु प्रत्यक्ष हुआ सा दिखलाता है। - माधव शुक्ल।

संस्कृत मां, हिंदी गृहिणी और अंग्रेजी नौकरानी है। - डॉ. फादर कामिल बुल्के।

भाषा विचार की पोशाक है। - डॉ. जानसन।

रामचरित मानस हिंदी साहित्य का कोहनूर है। - यशोदानंदन अखौरी।

साहित्य के हर पथ पर हमारा कारवाँ तेजी से बढ़ता जा रहा है। - रामवृक्ष बेनीपुरी।

कवि संमेलन हिंदी प्रचार के बहुत उपयोगी साधन हैं। - श्रीनारायण चतुर्वेदी।

हिंदी चिरकाल से ऐसी भाषा रही है जिसने मात्र विदेशी होने के कारण किसी शब्द का बहिष्कार नहीं किया। - राजेंद्रप्रसाद।

देवनागरी अक्षरों का कलात्मक सौंदर्य नष्ट करना कहाँ की बुद्धिमानी है? - शिवपूजन सहाय।

जिस देश को अपनी भाषा और अपने साहित्य के गौरव का अनुभव नहीं है, वह उन्नत नहीं हो सकता। - देशरत्न डॉ. राजेन्द्रप्रसाद।

कविता कामिनि भाल में हिंदी बिंदी रूप, प्रकट अग्रवन में भई ब्रज के निकट अनूप। - राधाचरण गोस्वामी।

हिंदी समस्त आर्यावर्त की भाषा है। - शारदाचरण मित्र।

हिंदी भारतीय संस्कृति की आत्मा है। - कमलापति त्रिपाठी।

मैं उर्दू को हिंदी की एक शैली मात्र मानता। - मनोरंजन प्रसाद।

हिंदी भाषा को भारतीय जनता तथा संपूर्ण मानवता के लिये बहुत बड़ा उत्तरदायित्व सँभालना है। - सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या।

नागरीप्रचारिणी सभा, काशी की हीरकजयंती के पावन अवसर पर उपस्थित न हो सकने का मुझे बड़ा खेद है। - (प्रो.) तान युन् शान।

राष्ट्रभाषा हिंदी हो जाने पर भी हमारे व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन पर विदेशी भाषा का प्रभुत्व अत्यंत गर्हित बात है। - कमलापति त्रिपाठी।

सभ्य संसार के सारे विषय हमारे साहित्य में आ जाने की ओर हमारी सतत् चेष्टा रहनी चाहिए। - श्रीधर पाठक।

भारतवर्ष के लिए हिंदी भाषा ही सर्वसाधरण की भाषा होने के उपयुक्त है। - शारदाचरण मित्र।

हिंदी भाषा और साहित्य ने तो जन्म से ही अपने पैरों पर खड़ा होना सीखा है। - धीरेन्द्र वर्मा।

जब हम अपना जीवन, जननी हिंदी, मातृभाषा हिंदी के लिये समर्पण कर दे तब हम किसी के प्रेमी कहे जा सकते हैं। - सेठ गोविंददास।

कविता सुखी और उत्तम मनुष्यों के उत्तम और सुखमय क्षणों का उद्गार है। - शेली।

भाषा की समस्या का समाधान सांप्रदायिक दृष्टि से करना गलत है। - लक्ष्मीनारायण सुधांशु

भारतीय साहित्य और संस्कृति को हिंदी की देन बड़ी महत्त्वपूर्ण है। - सम्पूर्णानन्द।

हिंदी के पुराने साहित्य का पुनरुद्धार प्रत्येक साहित्यिक का पुनीत कर्तव्य है। - पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल।

परमात्मा से प्रार्थना है कि हिंदी का मार्ग निष्कंटक करें। - हरगोविंद सिंह।

अहिंदी भाषा-भाषी प्रांतों के लोग भी सरलता से टूटी-फूटी हिंदी बोलकर अपना काम चला लेते हैं। - अनंतशयनम् आयंगार।

वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। - मैथिलीशरण गुप्त।

दाहिनी हो पूर्ण करती है अभिलाषा पूज्य हिंदी भाषा हंसवाहिनी का अवतार है। - अज्ञात।

वास्तविक महान् व्यक्ति तीन बातों द्वारा जाना जाता है- योजना में उदारता, उसे पूरा करने में मनुष्यता और सफलता में संयम। - बिस्मार्क।

हिंदुस्तान की भाषा हिंदी है और उसका दृश्यरूप या उसकी लिपि सर्वगुणकारी नागरी ही है। - गोपाललाल खत्री।

कविता मानवता की उच्चतम अनुभूति की अभिव्यक्ति है। - हजारी प्रसाद द्विवेदी।

हिंदी ही के द्वारा अखिल भारत का राष्ट्रनैतिक ऐक्य सुदृढ़ हो सकता है। - भूदेव मुखर्जी।

हिंदी का शिक्षण भारत में अनिवार्य ही होगा। - सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या।

हिंदी, नागरी और राष्ट्रीयता अन्योन्याश्रित है। - नन्ददुलारे वाजपेयी।

अकबर की सभा में सूर के जसुदा बार-बार यह भाखै पद पर बड़ा स्मरणीय विचार हुआ था।- राधाचरण गोस्वामी।

देशभाषा की उन्नति से ही देशोन्नति होती है। - सुधाकर द्विवेदी।

हिंदी साहित्य धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष इस चतु:पुरुषार्थ का साधक अतएव जनोपयोगी। - (डॉ.) भगवानदास।

हिंदी उन सभी गुणों से अलंकृत है जिनके बल पर वह विश्व की साहित्यिक भाषाओं की अगली श्रेणी में सभासीन हो सकती है। - मैथिलीशरण गुप्त।

वाणी, सभ्यता और देश की रक्षा करना सच्चा धर्म यज्ञ है। - ठाकुरदत्त शर्मा।

निष्काम कर्म ही सर्वोत्तम कार्य है, जो तृप्ति प्रदाता है और व्यक्ति और समाज की शक्ति बढ़ाता है। - पंडित सुधाकर पांडेय।

अब हिंदी ही माँ भारती हो गई है- वह सबकी आराध्य है, सबकी संपत्ति है। - रविशंकर शुक्ल।

बच्चों को विदेशी लिपि की शिक्षा देना उनको राष्ट्र के सच्चे प्रेम से वंचित करना है। - भवानीदयाल संन्यासी।

यहाँ (दिल्ली) के खुशबयानों ने मताहिद (गिनी चुनी) जबानों से अच्छे अच्छे लफ्ज निकाले और बाजे इबारतों और अल्फाज में तसर्रूफ (परिवर्तन) करके एक नई जवान पैदा की जिसका नाम उर्दू रखा है। - दरियाये लताफत।

भाषा और राष्ट्र में बड़ा घनिष्ट संबंध है। - (राजा) राधिकारमण प्रसाद सिंह।

अगर उर्दूवालों की नीति हिंदी के बहिष्कार की न होती तो आज लिपि के सिवा दोनों में कोई भेद न पाया जाता। - देशरत्न डॉ. राजेंद्रप्रसाद।

हिंदी भाषा की उन्नति का अर्थ है राष्ट्र और जाति की उन्नति। - रामवृक्ष बेनीपुरी।

बाजारवाली बोली विश्वविद्यालयों में काम नहीं दे सकती। - संपूर्णानंद।

भारतेंदु का साहित्य मातृमंदिर की अर्चना का साहित्य है। - बदरीनाथ शर्मा।

तलवार के बल से न कोई भाषा चलाई जा सकती है न मिटाई। - शिवपूजन सहाय।

अखिल भारत के परस्पर व्यवहार के लिये ऐसी भाषा की आवश्यकता है जिसे जनता का अधिकतम भाग पहले से ही जानता समझता है। - महात्मा गाँधी।

हिंदी को राजभाषा करने के बाद पूरे पंद्रह वर्ष तक अंग्रेजी का प्रयोग करना पीछे कदम हटाना है।- राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन।

भाषा राष्ट्रीय शरीर की आत्मा है। - स्वामी भवानीदयाल संन्यासी।

हिंदी के राष्ट्रभाषा होने से जहाँ हमें हर्षोल्लास है, वहीं हमारा उत्तरदायित्व भी बहुत बढ़ गया है।- मथुरा प्रसाद दीक्षित।

भारतवर्ष में सभी विद्याएँ सम्मिलित परिवार के समान पारस्परिक सद्भाव लेकर रहती आई हैं।- रवींद्रनाथ ठाकुर।

इतिहास को देखते हुए किसी को यह कहने का अधिकारी नहीं कि हिंदी का साहित्य जायसी के पहले का नहीं मिलता। - (डॉ.) काशीप्रसाद जायसवाल।

संप्रति जितनी भाषाएं भारत में प्रचलित हैं उनमें से हिंदी भाषा प्राय: सर्वत्र व्यवहृत होती है। - केशवचंद्र सेन।

हिंदी ने राष्ट्रभाषा के पद पर सिंहानसारूढ़ होने पर अपने ऊपर एक गौरवमय एवं गुरुतर उत्तरदायित्व लिया है। - गोविंदबल्लभ पंत।

हिंदी जिस दिन राजभाषा स्वीकृत की गई उसी दिन से सारा राजकाज हिंदी में चल सकता था। - सेठ गोविंददास।

हिंदी भाषी प्रदेश की जनता से वोट लेना और उनकी भाषा तथा साहित्य को गालियाँ देना कुछ नेताओं का दैनिक व्यवसाय है। - (डॉ.) रामविलास शर्मा।

जब एक बार यह निश्चय कर लिया गया कि सन् १९६५ से सब काम हिंदी में होगा, तब उसे अवश्य कार्यान्वित करना चाहिए। - सेठ गोविंददास।

साहित्यसेवा और धर्मसाधना पर्यायवायी है। - (म. म.) सत्यनारायण शर्मा।

जिसका मन चाहे वह हिंदी भाषा से हमारा दूर का संबंध बताये, मगर हम बिहारी तो हिंदी को ही अपनी भाषा, मातृभाषा मानते आए हैं। - शिवनंदन सहाय।

उर्दू का ढाँचा हिंदी है, लेकिन सत्तर पचहत्तर फीसदी उधार के शब्दों से उर्दू दाँ तक तंग आ गए हैं। - राहुल सांकृत्यायन।

मानस भवन में आर्यजन जिसकी उतारें आरती। भगवान भारतवर्ष में गूँजे हमारी भारती। - मैथिलीशरण गुप्त।

गद्य जीवनसंग्राम की भाषा है। इसमें बहुत कार्य करना है, समय थोड़ा है। - सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

अंग्रेजी हमें गूँगा और कूपमंडूक बना रही है। - ब्रजभूषण पांडेय।

लाखों की संख्या में छात्रों की उस पलटन से क्या लाभ जिनमें अंग्रेजी में एक प्रार्थनापत्र लिखने की भी क्षमता नहीं है। - कंक।

मैं राष्ट्र का प्रेम, राष्ट्र के भिन्न-भिन्न लोगों का प्रेम और राष्ट्रभाषा का प्रेम, इसमें कुछ भी फर्क नहीं देखता। - र. रा. दिवाकर।

देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता स्वयं सिद्ध है। - महावीर प्रसाद द्विवेदी।

हिमालय से सतपुड़ा और अंबाला से पूर्णिया तक फैला हुआ प्रदेश हिंदी का प्रकृत प्रांत है। - राहुल सांकृत्यायन।

किसी राष्ट्र की राजभाषा वही भाषा हो सकती है जिसे उसके अधिकाधिक निवासी समझ सके। - (आचार्य) चतुरसेन शास्त्री।

साहित्य के इतिहास में काल विभाजन के लिए तत्कालीन प्रवृत्तियों को ही मानना न्यायसंगत है। - अंबाप्रसाद सुमन।

हिंदी भाषा हमारे लिये किसने बनाया? प्रकृति ने। हमारे लिये हिंदी प्रकृतिसिद्ध है। - पं. गिरिधर शर्मा।

हिंदी भाषा उस समुद्र जलराशि की तरह है जिसमें अनेक नदियाँ मिली हों। - वासुदेवशरण अग्रवाल।

भाषा देश की एकता का प्रधान साधन है। - (आचार्य) चतुरसेन शास्त्री।

क्रांतदर्शी होने के कारण ऋषि दयानंद ने देशोन्नति के लिये हिंदी भाषा को अपनाया था। - विष्णुदेव पौद्दार।

सच्चा राष्ट्रीय साहित्य राष्ट्रभाषा से उत्पन्न होता है। - वाल्टर चेनिंग।

हिंदी के पौधे को हिंदू मुसलमान दोनों ने सींचकर बड़ा किया है। - जहूरबख्श।

किसी लफ्ज के उर्दू न होने से मुराद है कि उर्दू में हुरूफ की कमी बेशी से वह खराद पर नहीं चढ़ा। - सैयद इंशा अल्ला खाँ।

अंग्रेजी का पद चिरस्थायी करना देश के लिये लज्जा की बात है - संपूर्णानंद।

हिंदी राष्ट्रभाषा है, इसलिये प्रत्येक व्यक्ति को, प्रत्येक भारतवासी को इसे सीखना चाहिए। - रविशंकर शुक्ल।

हिंदी प्रांतीय भाषा नहीं बल्कि वह अंत:प्रांतीय राष्ट्रीय भाषा है। - छविनाथ पांडेय।

साहित्य को उच्च अवस्था पर ले जाना ही हमारा परम कर्तव्य है। - पार्वती देवी।

विश्व की कोई भी लिपि अपने वर्तमान रूप में नागरी लिपि के समान नहीं। - चंद्रबली पांडेय।

भाषा की एकता जाति की एकता को कायम रखती है। - राहुल सांकृत्यायन।

जिस राष्ट्र की जो भाषा है उसे हटाकर दूसरे देश की भाषा को सारी जनता पर नहीं थोपा जा सकता - वासुदेवशरण अग्रवाल।

पराधीनता की विजय से स्वाधीनता की पराजय सहस्रगुना अच्छी है। - अज्ञात।

समाज के अभाव में आदमी की आदमियत की कल्पना नहीं की जा सकती। - पं. सुधाकर पांडेय।

तुलसी, कबीर, नानक ने जो लिखा है, उसे मैं पढ़ता हूँ तो कोई मुश्किल नहीं आती। - मौलाना मुहम्मद अली।

भाषा का निर्माण सेक्रेटरियट में नहीं होता, भाषा गढ़ी जाती है जनता की जिह्वा पर। - रामवृक्ष बेनीपुरी।

हिंदी भाषी ही एक ऐसी भाषा है जो सभी प्रांतों की भाषा हो सकती है। - पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार।

जब हम हिंदी की चर्चा करते हैं तो वह हिंदी संस्कृति का एक प्रतीक होती है। - शांतानंद नाथ।

भारतीय धर्म की है घोषणा घमंड भरी, हिंदी नहीं जाने उसे हिंदू नहीं जानिए। - नाथूराम शंकर शर्मा।

राजनीति के चिंतापूर्ण आवेग में साहित्य की प्रेरणा शिथिल नहीं होनी चाहिए। - राजकुमार वर्मा।

हिंदी में जो गुण है उनमें से एक यह है कि हिंदी मर्दानी जबान है। - सुनीति कुमार चाटुर्ज्या।

स्पर्धा ही जीवन है, उसमें पीछे रहना जीवन की प्रगति खोना है। - निराला।

कविता हमारे परिपूर्ण क्षणों की वाणी है। - सुमित्रानंदन पंत।

बिना मातृभाषा की उन्नति के देश का गौरव कदापि वृद्धि को प्राप्त नहीं हो सकता। - गोविंद शास्त्री दुगवेकर।

उर्दू लिपि की अनुपयोगिता, भ्रामकता और कठोरता प्रमाणित हो चुकी है। - रामरणविजय सिंह।

राष्ट्रभाषा राष्ट्रीयता का मुख्य अंश है। - श्रीमती सौ. चि. रमणम्मा देव।

बानी हिंदी भाषन की महरानी, चंद्र, सूर, तुलसी से जामें भए सुकवि लासानी। - पं. जगन्नाथ चतुर्वेदी।

जय जय राष्ट्रभाषा जननि। जयति जय जय गुण उजागर राष्ट्रमंगलकरनि। - देवी प्रसाद गुप्त।

हिंदी हमारी हिंदू संस्कृति की वाणी ही तो है। - शांतानंद नाथ।

आज का लेखक विचारों और भावों के इतिहास की वह कड़ी है जिसके पीछे शताब्दियों की कड़ियाँ जुड़ी है। - माखनलाल चतुर्वेदी।

विज्ञान के बहुत से अंगों का मूल हमारे पुरातन साहित्य में निहित है। - सूर्यनारायण व्यास।

कोई कौम अपनी जबान के बगैर अच्छी तालीम नहीं हासिल कर सकती। - सैयद अमीर अली मीर

हिंदी और उर्दू में झगड़ने की बात ही नहीं है। - ब्रजनंदन सहाय।

कविता हृदय की मुक्त दशा का शाब्दिक विधान है। - रामचंद्र शुक्ल।

हमारी राष्ट्रभाषा का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीयता का दृढ़ निर्माण है। - चंद्रबली पांडेय।

जिस शिक्षा से स्वाभिमान की वृत्ति जाग्रत नहीं होती वह शिक्षा किसी काम की नहीं। - माधवराव सप्रे।

कालोपयोगी कार्य न कर सकने पर महापुरुष बन सकना संभव नहीं है। - सू. च. धर।

मैं दुनिया की सब भाषाओं की इज्जत करता हूँ, परन्तु मेरे देश में हिंदी की इज्जत न हो, यह मैं नहीं सह सकता। - विनोबा भावे।

आज का आविष्कार कल का साहित्य है। - माखनलाल चतुर्वेदी।

भाषा के सवाल में मजहब को दखल देने का कोई हक नहीं। - राहुल सांकृत्यायन।

जब तक संघ शक्ति उत्पन्न न होगी तब तक प्रार्थना में कुछ जान नहीं हो सकती। - माधव राव सप्रे।

हिंदी विश्व की महान भाषा है। - राहुल सांकृत्यायन।

राष्ट्रीय एकता के लिये एक भाषा से कहीं बढ़कर आवश्यक एक लिपि का प्रचार होना है। - ब्रजनंदन सहाय।

जो ज्ञान तुमने संपादित किया है उसे वितरित करते रहो ओर सबको ज्ञानवान बनाकर छोड़ो। - संत रामदास।

पाँच मत उधर और पाँच मत इधर रहने से श्रेष्ठता नहीं आती। - माखनलाल चतुर्वेदी।

मैं मानती हूँ कि हिंदी प्रचार से राष्ट्र का ऐक्य जितना बढ़ सकता है वैसा बहुत कम चीजों से बढ़ सकेगा। - लीलावती मुंशी।

हिंदी उर्दू के नाम को दूर कीजिए एक भाषा बनाइए। सबको इसके लिए तैयार कीजिए। - देवी प्रसाद गुप्त।

साहित्यकार विश्वकर्मा की अपेक्षा कहीं अधिक सामर्थ्यशाली है। - पं. वागीश्वर जी।

हिंदी भाषा और हिंदी साहित्य को सर्वांगसुंदर बनाना हमारा कर्त्तव्य है। - डॉ. राजेंद्रप्रसाद।

हिंदी साहित्य की नकल पर कोई साहित्य तैयार नहीं होता। - सूर्य कांत त्रिपाठी निराला

भाषा के उत्थान में एक भाषा का होना आवश्यक है। इसलिये हिंदी सबकी साझा भाषा है। - पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार।

यदि स्वदेशाभिमान सीखना है तो मछली से जो स्वदेश (पानी) के लिये तड़प तड़प कर जान दे देती है। - सुभाषचंद्र बसु।

पिछली शताब्दियों में संसार में जो राजनीतिक क्रांतियाँ हुई, प्राय: उनका सूत्रसंचालन उस देश के साहित्यकारों ने किया है। - पं. वागीश्वर जी।

विजयी राष्ट्रवाद अपने आपको दूसरे देशों का शोषण कर जीवित रखना चाहता है। - बी. सी. जोशी।

हिंदी हमारे देश और भाषा की प्रभावशाली विरासत है। - माखनलाल चतुर्वेदी।

यदि लिपि का बखेड़ा हट जाये तो हिंदी उर्दू में कोई विवाद ही न रहे। - बृजनंदन सहाय।

भारत सरस्वती का मुख संस्कृत है। - म. म. रामावतार शर्मा।

साधारण कथा कहानियों तथा बालोपयोगी कविता में संस्कृत के सामासिक शब्द लाने से उनके मूल उद्देश्य की सफलता में बाधा पड़ती है। - रघुवरप्रसाद द्विवेदी।

यदि आप मुझे कुछ देना चाहती हों तो इस पाठशाला की शिक्षा का माध्यम हमारी मातृभाषा कर दें। - एक फ्रांसीसी बालिका।

निर्मल चरित्र ही मनुष्य का शृंगार है। - पंडित सुधाकर पांडेय।

हिंदुस्तान को छोड़कर दूसरे मध्य देशों में ऐसा कोई अन्य देश नहीं है, जहाँ कोई राष्ट्रभाषा नहीं हो। - सैयद अमीर अली मीर।

इतिहास में जो सत्य है वही अच्छा है और जो असत्य है वही बुरा है। - जयचंद्र विद्यालंकार।

सरलता, बोधगम्यता और शैली की दृष्टि से विश्व की भाषाओं में हिंदी महानतम स्थान रखती है। - अमरनाथ झा।

हिंदी सरल भाषा है। इसे अनायास सीखकर लोग अपना काम निकाल लेते हैं। - जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी।

एक भाषा का प्रचार रहने पर केवल इसी के सहारे, यदि लिपिगत भिन्नता न हो तो, अन्यान्य राष्ट्र गठन के उपकरण आ जाने संभव हो सकते हैं। - अयोध्याप्रसाद वर्मा।

किसी भाषा की उन्नति का पता उसमें प्रकाशित हुई पुस्तकों की संख्या तथा उनके विषय के महत्व से जाना जा सकता है। - गंगाप्रसाद अग्निहोत्री।

जीवन के छोटे से छोटे क्षेत्र में हिंदी अपना दायित्व निभाने में समर्थ है। - पुरुषोत्तमदास टंडन।

बिहार में ऐसा एक भी गाँव नहीं है जहाँ केवल रामायण पढ़ने के लिये दस-बीस मनुष्यों ने हिंदी न सीखी हो। - सकलनारायण पांडेय।

संस्कृत की इशाअत (प्रचार) का एक बड़ा फायदा यह होगा कि हमारी मुल्की जबान (देशभाषा) वसीअ (व्यापक) हो जायगी। - मौलवी महमूद अली।

संसार में देश के नाम से भाषा को नाम दिया जाता है और वही भाषा वहाँ की राष्ट्रभाषा कहलाती है। - ताराचंद्र दूबे।

सर्वसाधारण पर जितना पद्य का प्रभाव पड़ता है उतना गद्य का नहीं। - राजा कृत्यानंद सिंह।

जो गुण साहित्य की जीवनी शक्ति के प्रधान सहायक होते हैं उनमें लेखकों की विचारशीलता प्रधान है। - नरोत्तम व्यास।

भाषा और भाव का परिवर्तन समाज की अवस्था और आचार विचार से अधिक संबंध रखता है। - बदरीनाथ भट्ट।

साहित्य पढ़ने से मुख्य दो बातें तो अवश्य प्राप्त होती हैं, अर्थात् मन की शक्तियों को विकास और ज्ञान पाने की लालसा। - बिहारीलाल चौबे।

देवनागरी और बंगला लिपियों को साथ मिलाकर देखना है। - मन्नन द्विवेदी।

है भव्य भारत ही हमारी मातृभूमि हरी भरी। हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा और लिपि है नागरी। - मैथिलीशरण गुप्त।

संस्कृत की विरासत हिंदी को तो जन्म से ही मिली है। - राहुल सांकृत्यायन।

कैसे निज सोये भाग को कोई सकता है जगा, जो निज भाषा-अनुराग का अंकुर नहिं उर में उगा। - हरिऔध।

हिंदी में हम लिखें पढ़ें, हिंदी ही बोलें। - पं. जगन्नाथप्रसाद चतुर्वेदी।

जिस वस्तु की उपज अधिक होती है उसमें से बहुत सा भाग फेंक भी दिया जाता है। ग्रंथों के लिये भी ऐसा ही हिसाब है। - गिरजाकुमार घोष।

यह जो है कुरबान खुदा का, हिंदी करे बयान सदा का। - अज्ञात।

क्या संसार में कहीं का भी आप एक दृष्टांत उद्धृत कर सकते हैं जहाँ बालकों की शिक्षा विदेशी भाषाओं द्वारा होती हो। - डॉ. श्यामसुंदर दास।

बँगला वर्णमाला की जाँच से मालूम होता है कि देवनागरी लिपि से निकली है और इसी का सीधा सादा रूप है। - रमेशचंद्र दत्त।

वास्तव में वेश, भाषा आदि के बदलने का परिणाम यह होता है कि आत्मगौरव नष्ट हो जाता है, जिससे देश का जातित्व गुण मिट जाता है। - सैयद अमीर अली मीर

दूसरों की बोली की नकल करना भाषा के बदलने का एक कारण है। - गिरींद्रमोहन मित्र।

समालोचना ही साहित्य मार्ग की सुंदर सड़क है। - म. म. गिरधर शर्मा चतुर्वेदी।

नागरी वर्णमाला के समान सर्वांगपूर्ण और वैज्ञानिक कोई दूसरी वर्णमाला नहीं है। - बाबू राव विष्णु पराड़कर।

अन्य देश की भाषा ने हमारे देश के आचार व्यवहार पर कैसा बुरा प्रभाव डाला है। - अनादिधन वंद्योपाध्याय।

व्याकरण चाहे जितना विशाल बने परंतु भाषा का पूरा-पूरा समाधान उसमें नहीं हो सकता। - अनंतराम त्रिपाठी।

स्वदेशप्रेम, स्वधर्मभक्ति और स्वावलंबन आदि ऐसे गुण हैं जो प्रत्येक मनुष्य में होने चाहिए। - रामजी लाल शर्मा।

गुणवान खानखाना सदृश प्रेमी हो गए रसखान और रसलीन से हिंदी प्रेमी हो गए। - राय देवीप्रसाद।

वैज्ञानिक विचारों के पारिभाषिक शब्दों के लिये, किसी विषय के उच्च भावों के लिये, संस्कृत साहित्य की सहायता लेना कोई शर्म की बात नहीं है। - गणपति जानकीराम दूबे।

हिंदुस्तान के लिये देवनागरी लिपि का ही व्यवहार होना चाहिए, रोमन लिपि का व्यवहार यहाँ हो ही नहीं सकता। - महात्मा गाँधी।

अभिमान सौंदर्य का कटाक्ष है। - अज्ञात।

कवि का हृदय कोमल होता है। - गिरिजाकुमार घोष।

श्री रामायण और महाभारत भारत के ही नहीं वरन् पृथ्वी भर के जैसे अमूल्य महाकाव्य हैं। - शैलजाकुमार घोष।

हिंदी किसी के मिटाने से मिट नहीं सकती। - चंद्रबली पाण्डेय।

भाषा की उन्नति का पता मुद्रणालयों से भी लग सकता है। - गंगाप्रसाद अग्निहोत्री।

पुस्तक की उपयोगिता को चिरस्थायी रखने के लिए उसे भावी संतानों के लिये पथप्रदर्शक बनाने के लिये यह आवश्यक है कि पुस्तक के असली लेखक का नाम उस पर रहे। - सत्यदेव परिव्राजक।

खड़ी बोली का एक रूपांतर उर्दू है। - बदरीनाथ भट्ट।

भारतवर्ष मनुष्य जाति का गुरु है। - विनयकुमार सरकार।

हमारी भारत भारती की शैशवावस्था का रूप ब्राह्मी या देववाणी है, उसकी किशोरावस्था वैदिक भाषा और संस्कृति उसकी यौवनावस्था की संुदर मनोहर छटा है। - बदरीनारायण चौधरी प्रेमधन

हृतंत्री की तान पर नीरव गान गाने से न किसी के प्रति किसी की अनुकम्पा जगती है और न कोई किसी का उपकार करने पर ही उतारू होता है। - रामचंद्र शुक्ल।

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल। - भारतेंदू हरिश्चंद्र।

आर्यों की सबसे प्राचीन भाषा हिंदी ही है और इसमें तद्भव शब्द सभी भाषाओं से अधिक है। - वीम्स साहब।

क्यों न वह फिर रास्ते पर ठीक चलने से डिगे , हैं बहुत से रोग जिसके एक ही दिल में लगे। - हरिऔध।

जब तक साहित्य की उन्नति न होगी, तब तक संगीत की उन्नति नहीं हो सकती। - विष्णु दिगंबर।

जो पढ़ा-लिखा नहीं है - जो शिक्षित नहीं है वह किसी भी काम को भली-भाँति नहीं कर सकता। - गोपाललाल खत्री।

राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूँगा है। - महात्मा गाँधी।

जिस प्रकार बंगाल भाषा के द्वारा बंगाल में एकता का पौधा प्रफुल्लित हुआ है उसी प्रकार हिंदी भाषा के साधारण भाषा होने से समस्त भारतवासियों में एकता तरु की कलियाँ अवश्य ही खिलेंगी। - शारदाचरण मित्र।

इतिहास स्वदेशाभिमान सिखाने का साधन है। - महात्मा गांधी।

जो दिखा सके वही दर्शन शास्त्र है नहीं तो वह अंधशास्त्र है। - डॉ. भगवानादास।

विदेशी लोगों का अनुकरण न किया जाय। - भीमसेन शर्मा।

भारतवर्ष के लिये देवनागरी साधारण लिपि हो सकती है और हिंदी भाषा ही सर्वसाधारण की भाषा होने के उपयुक्त है। - शारदाचरण मित्र।

अकबर का शांत राज्य हमारी भाषा का मानो स्वर्णमय युग था। - छोटूलाल मिश्र।

नाटक का जितना ऊँचा दरजा है, उपन्यास उससे सूत भर भी नीचे नहीं है। - गोपालदास गहमरी।

किसी भी बृहत् कोश में साहित्य की सब शाखाओं के शब्द होने चाहिए। - महावीर प्रसाद द्विवेदी।

जो कुछ भी नजर आता है वह जमीन और आसमान की गोद में उतना सुंदर नहीं जितना नजर में है। - निराला

देव, जगदेव, देश जाति की सुखद प्यारी, जग में गुणगरी सुनागरी हमारी है। - चकोर

शिक्षा का मुख्य तात्पर्य मानसिक उन्नति है। - पं. रामनारायण मिश्र।

भारत के एक सिरे से दूसरे सिरे तक हिंदी भाषा कुछ न कुछ सर्वत्र समझी जाती है। - पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार।

जापानियों ने जिस ढंग से विदेशी भाषाएँ सीखकर अपनी मातृभाषा को उन्नति के शिखर पर पहुँचाया है उसी प्रकार हमें भी मातृभाषा का भक्त होना चाहिए। - श्यामसुंदर दास।

विचारों का परिपक्व होना भी उसी समय संभव होता है, जब शिक्षा का माध्यम प्रकृतिसिद्ध मातृभाषा हो। - पं. गिरधर शर्मा।

विज्ञान को विज्ञान तभी कह सकते हैं जब वह शरीर, मन और आत्मा की भूख मिटाने की पूरी ताकत रखता हो। - महात्मा गांधी।

यह महात्मा गाँधी का प्रताप है, जिनकी मातृभाषा गुजराती है पर हिंदी को राष्ट्रभाषा जानकर जो उसे अपने प्रेम से सींच रहे हैं। - लक्ष्मण नारायण गर्दे।

हिंदी भाषा के लिये मेरा प्रेम सब हिंदी प्रेमी जानते हैं। - महात्मा गांधी।

सब विषयों के गुण-दोष सबकी दृष्टि में झटपट तो नहीं आ जाते। - म. म. गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी।

किसी देश में ग्रंथ बनने तक वैदेशिक भाषा में शिक्षा नहीं होती थी। देश भाषाओं में शिक्षा होने के कारण स्वयं ग्रंथ बनते गए हैं। - साहित्याचार्य रामावतार शर्मा।

जो भाषा सामयिक दूसरी भाषाओं से सहायता नहीं लेती वह बहुत काल तक जीवित नहीं रह सकती। - पांडेय रामवतार शर्मा।

नागरीप्रचारिणी सभा के गुण भारी जिन तेरों देवनागरी प्रचार करिदीनो है। - नाथूराम शंकर शर्मा।

जितना और जैसा ज्ञान विद्यार्थियों को उनकी जन्मभाषा में शिक्षा देने से अल्पकाल में हो सकता है; उतना और वैसा पराई भाषा में सुदीर्घ काल में भी होना संभव नहीं है। - घनश्याम सिंह।

विदेशी भाषा में शिक्षा होने के कारण हमारी बुद्धि भी विदेशी हो गई है। - माधवराव सप्रे।

मैं महाराष्ट्री हूँ, परंतु हिंदी के विषय में मुझे उतना ही अभिमान है जितना किसी हिंदी भाषी को हो सकता है। - माधवराव सप्रे।

मनुष्य सदा अपनी मातृभाषा में ही विचार करता है। इसलिये अपनी भाषा सीखने में जो सुगमता होती है दूसरी भाषा में हमको वह सुगमता नहीं हो सकती। - डॉ. मुकुन्दस्वरूप वर्मा।

हिंदी भाषा का प्रश्न स्वराज्य का प्रश्न है। - महात्मा गांधी।

राष्ट्रीयता का भाषा और साहित्य के साथ बहुत ही घनिष्ट और गहरा संबंध है। - डॉ. राजेन्द्र प्रसाद।

यदि हम अंग्रेजी दूसरी भाषा के समान पढ़ें तो हमारे ज्ञान की अधिक वृद्धि हो सकती है। - जगन्नाथप्रसाद चतुर्वेदी।

स्वतंत्रता की कोख से ही आलोचना का जन्म है। - मोहनलाल महतो वियोगी।

युग के साथ न चल सकने पर महात्माओं का महत्त्व भी म्लान हो उठता है। - सु. च. धर।

हिंदी पर ना मारो ताना, सभा बतावे हिंदी माना। - नूर मुहम्मद।

आप जिस तरह बोलते हैं, बातचीत करते हैं, उसी तरह लिखा भी कीजिए। भाषा बनावटी न होनी चाहिए। - महावीर प्रसाद द्विवेदी।

हिंदी भाषा की उन्नति के बिना हमारी उन्नति असम्भव है। - गिरधर शर्मा।

भाषा ही राष्ट्र का जीवन है। - पुरुषोत्तमदास टंडन।

देह प्राण का ज्यों घनिष्ट संबंध अधिकतर। है तिससे भी अधिक देशभाषा का गुरुतर। - माधव शुक्ल।

जब हम अपना जीवन जननी हिंदी, मातृभाषा हिंदी के लिये समर्पण कर दें तब हम हिंदी के प्रेमी कहे जा सकते हैं। - गोविन्ददास।

नागरी प्रचार देश उन्नति का द्वार है। - गोपाललाल खत्री।

देश तथा जाति का उपकार उसके बालक तभी कर सकते हैं, जब उन्हें उनकी भाषा द्वारा शिक्षा मिली हो। - पं. गिरधर शर्मा।

राष्ट्रभाषा की साधना कोरी भावुकता नहीं है। - जगन्नाथप्रसाद मिश्र।

साहित्य को स्वैर संचा करने की इजाजत न किसी युग में रही होगी न वर्तमान युग में मिल सकती है। - माखनलाल चतुर्वेदी।

अंग्रेजी सीखकर जिन्होंने विशिष्टता प्राप्त की है, सर्वसाधारण के साथ उनके मत का मेल नहीं होता। हमारे देश में सबसे बढ़कर जातिभेद वही है, श्रेणियों में परस्पर अस्पृश्यता इसी का नाम है। - रवीन्द्रनाथ ठाकुर।

साहित्य की सेवा भगवान का कार्य है, आप काम में लग जाइए आपको भगवान की सहायता प्राप्त होगी और आपके मनोरथ परिपूर्ण होंगे। - चंद्रशेखर मिश्र।

सब से जीवित रचना वह है जिसे पढ़ने से प्रतीत हो कि लेखक ने अंतर से सब कुछ फूल सा प्रस्फुटित किया है। - शरच्चंद।

सिक्ख गुरुओं ने आपातकाल में हिंदी की रक्षा के लिये ही गुरुमुखी रची थी। - संतराम शर्मा।

हिंदी जैसी सरल भाषा दूसरी नहीं है। - मौलाना हसरत मोहानी।

ऐसे आदमी आज भी हमारे देश में मौजूद हैं जो समझते हैं कि शिक्षा को मातृभाषा के आसन पर बिठा देने से उसकी कीमत ही घट जायेगी। - रवीन्द्रनाथ ठाकुर।

लोकोपकारी विषयों को आदर देने वाली नवीन प्रथा का स्थिर हो जाना ही एक बहुत बड़ा उत्साहप्रद कार्य है। - मिश्रबंधु।

हमारे साहित्य को कामधेनु बनाना है। - चंद्रबली पांडेय।

भारत के विभिन्न प्रदेशों के बीच हिंदी प्रचार द्वारा एकता स्थापित करने वाले सच्चे भारत बंधु हैं। - अरविंद।

हृदय की कोई भाषा नहीं है, हृदय-हृदय से बातचीत करता है। - महात्मा गांधी।

मेरा आग्रहपूर्वक कथन है कि अपनी सारी मानसिक शक्ति हिन्दी के अध्ययन में लगावें। - विनोबा भावे।

साहित्यिक इस बात को कभी न भूले कि एक ख्याल ही क्रिया का स्वामी है, उसे बढ़ाने, घटाने या ठुकरा देनेवाला। - माखनलाल चतुर्वेदी।

एशिया के कितने ही राष्ट्र आज यूरोपीय राष्ट्रों के चंगुल से छूट गए हैं पर उनकी आर्थिक दासता आज भी टिकी हुई है। - वी. सी. जोशी।

हिंदी द्वारा सारे भारत को एक सूत्र में पिरोया जा सकता है। - स्वामी दयानंद।

इस पथ का उद्देश्य नहीं है, श्रांत भवन में टिक रहना। - जयशंकर प्रसाद।

विद्या अच्छे दिनों में आभूषण है, विपत्ति में सहायक और बुढ़ापे में संचित सामग्री है। - अरस्तु।

अधिक अनुभव, अधिक विपत्ति सहना, और अधिक अध्ययन, ये ही विद्वता के तीन स्तंभ हैं। - डिजरायली।

जैसे-जैसे हमारे देश में राष्ट्रीयता का भाव बढ़ता जायेगा वैसे ही वैसे हिंदी की राष्ट्रीय सत्ता भी बढ़ेगी। - श्रीमती लोकसुन्दरी रामन् ।

शब्दे मारिया मर गया शब्दे छोड़ा राज। जे नर शब्द पिछानिया ताका सरिया काज। - कबीर।

यदि स्वदेशाभिमान सीखना है तो मछली से जो स्वदेश (पानी) के लिये तड़प-तड़पकर जान दे देती है। - सुभाषचन्द्र बसु।

प्रसिद्धि का भीतरी अर्थ यशविस्तार नहीं, विषय पर अच्छी सिद्धि पाना है। - सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

सरस्वती से श्रेष्ठ कोई वैद्य नहीं और उसकी साधना से बढ़कर कोई दवा नहीं है। - एक जपानी सूक्ति।

संस्कृत प्राकृत से संबंध विच्छेद कदापि श्रेयस्कर नहीं। - यशेदानंदन अखौरी।

राष्ट्रीय व्यवहार में हिंदी को काम में लाना देश की शीघ्र उन्नति के लिये आवश्यक है। - महात्मा गांधी।

शिक्षा का प्रचार और विद्या की उन्नति इसलिये अपेक्षित है कि जिससे हमारे -स्वत्व का रक्षण हो। - माधवराव सप्रे।

विधान भी स्याही का एक बिन्दु गिराकर भाग्यलिपि पर कालिमा चढ़ा देता है। - जयशंकर प्रसाद।

जीवित भाषा बहती नदी है जिसकी धारा नित्य एक ही मार्ग से प्रवाहित नहीं होती। - बाबूराव विष्णु पराड़कर।

वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। - मैथिलीशरण गुप्त।

हिन्दी उन सभी गुणों से अलंकृत है जिनके बल पर वह विश्व की साहित्यिक भाषाओं की अगली श्रेणी में सभासीन हो सकती है। - मैथिलीशरण गुप्त।

पराधीनता की विजय से स्वाधीनता की पराजय सहस्त्र गुना अच्छी है। - अज्ञात।

कलाकार अपनी प्रवृत्तियों से भी विशाल हैं। उसकी भावराशि अथाह और अचिंत्य है। - मैक्सिम गोर्की।

कला का सत्य जीवन की परिधि में सौन्दर्य के माध्यम द्वारा व्यक्त अखंड सत्य है। - महादेवी वर्मा।

क्षण प्रति-क्षण जो नवीन दिखाई पड़े वही रमणीयता का उत्कृष्ट रूप है। - माघ।

प्रसन्नता न हमारे अंदर है न बाहर वरन् वह हमारा ईश्वर के साथ ऐक्य है। - पास्कल।

हिन्दी भाषा और साहित्य ने तो जन्म से ही अपने पैरों पर खड़ा होना सीखा है। - धीरेन्द्र वर्मा।

साहित्यकार एक दीपक के समान है जो जलकर केवल दूसरों को ही प्रकाश देता है। - अज्ञात।

बिना मातृभाषा की उन्नति के देश का गौरव कदापि वृद्धि को प्राप्त नहीं हो सकता। - गोविन्द शास्त्री दुगवेकर।

विधाता कर्मानुसार संसार का निर्माण करता है किन्तु साहित्यकार इस प्रकार के बंधनों से ऊपर है। - बागीश्वरजी।

श्रद्धा महत्व की आनंदपूर्ण स्वीकृति के साथ-साथ पूज्य बुद्धि का संचार है। - रामचंद्र शुक्ल।

कविता सुखी और उत्तम मनुष्यों के उत्तम और सुखमय क्षणों का उद्गार है। - शेली।

भय ही पराधीनता है, निर्भयता ही स्वराज्य है। - प्रेमचंद।

वास्तविक महान् व्यक्ति तीन बातों द्वारा जाना जाता है-योजना में उदारता, उसे पूरी करने में मनुष्यता और सफलता में संयम। - बिस्मार्क।

रमणीय अर्थ का प्रतिपादन करने वाले शब्द का नाम काव्य है। - पंडितराज जगन्नाथ।

प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब होता है। - रामचंद्र शुक्ल।

अंग्रेजी को भारतीय भाषा बनाने का यह अभिप्राय है कि हम अपने भारतीय अस्तित्व को बिल्कुल मिटा दें। - पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार।

अंग्रेजी का मुखापेक्षी रहना भारतीयों को किसी प्रकार से शोभा नहीं देता है। - भास्कर गोविन्द धाणेकर।

यह हमारा दुर्भाग्य है कि हमारी शिक्षा विदेशी भाषा में होती है और मातृभाषा में नहीं होती। - माधवराव सप्रे।

भाषा ही राष्ट्र का जीवन है। - पुरुषोत्तमदास टंडन।

कविता मानवता की उच्चतम अनुभूति की अभिव्यक्ति है। - हजारी प्रसाद द्विवेदी।

हिंदी स्वयं अपनी ताकत से बढ़ेगी। - पं. नेहरू।

भाषा विचार की पोशाक है। - डॉ. जोनसन।

हमारी देवनागरी इस देश की ही नहीं समस्त संसार की लिपियों में सबसे अधिक वैज्ञानिक है। - सेठ गोविन्ददास।

अंग्रेजी के माया मोह से हमारा आत्मविश्वास ही नष्ट नहीं हुआ है, बल्कि हमारा राष्ट्रीय स्वाभिमान भी पददलित हुआ है। - लक्ष्मीनारायण सिंह सुधांशु

आइए हम आप एकमत हो कोई ऐसा उपाय करें जिससे राष्ट्रभाषा का प्रचार घर-घर हो जाये और राष्ट्र का कोई भी कोना अछूता न रहे। - चन्द्रबली पांडेय।

जैसे जन्मभूमि जगदम्बा का स्वरूप है वैसे ही मातृभाषा भी जगदम्बा का स्वरूप है। - गोविन्द शास्त्री दुगवेकर।

हिंदी और उर्दू की जड़ एक है, रूपरेखा एक है और दोनों को अगर हम चाहें तो एक बना सकते हैं। - डॉ. राजेन्द्र प्रसाद।

हिंदी आज साहित्य के विचार से रूढ़ियों से बहुत आगे है। विश्वसाहित्य में ही जानेवाली रचनाएँ उसमें हैं। - सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

भारत की रक्षा तभी हो सकती है जब इसके साहित्य, इसकी सभ्यता तथा इसके आदर्शों की रक्षा हो। - पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार।

हिंदी संस्कृत की बेटियों में सबसे अच्छी और शिरोमणि है। - ग्रियर्सन।

मैं नहीं समझता, सात समुन्दर पार की अंग्रेजी का इतना अधिकार यहाँ कैसे हो गया। - महात्मा गांधी।

मेरे लिये हिन्दी का प्रश्न स्वराज्य का प्रश्न है। - राजर्षि पुरुषोत्तमदास टण्डन।

संस्कृत को छोड़कर आज भी किसी भी भारतीय भाषा का वाङ्मय विस्तार या मौलिकता में हिन्दी के आगे नहीं जाता। - डॉ. सम्पूर्णानन्द।

उर्दू और हिंदी दोनों को मिला दो। अलग-अलग नाम नहीं होना चाहिए। - मौलाना मुहम्मद अली।

राष्ट्रभाषा के विषय में यह बात ध्यान में रखनी होगी कि यह राष्ट्र के सब प्रान्तों की समान और स्वाभाविक राष्ट्रभाषा है। - लक्ष्मण नारायण गर्दे।

प्रसन्नता न हमारे अंदर है न बाहर वरन् वह हमारा ईश्वर के साथ ऐक्य है। - पास्कल।

विदेशी भाषा के शब्द, उसके भाव तथा दृष्टांत हमारे हृदय पर वह प्रभाव नहीं डाल सकते जो मातृभाषा के चिरपरिचित तथा हृदयग्राही वाक्य। - मन्नन द्विवेदी।

जातीय भाव हमारी अपनी भाषा की ओर झुकता है। - शारदाचरण मित्र।

हिंदी अपनी भूमि की अधिष्ठात्री है। - राहुल सांकृत्यायन।

सारा शरीर अपना, रोम-रोम अपने, रंग और रक्त अपना, अंग प्रत्यंग अपने, किन्तु जुबान दूसरे की, यह कहाँ की सभ्यता और कहाँ की मनुष्यता है। - रणवीर सिंह जी।

वाणी, सभ्यता और देश की रक्षा करना सच्चा यज्ञ है। - ठाकुरदत्त शर्मा।

हिन्दी व्यापकता में अद्वितीय है। - अम्बिका प्रसाद वाजपेयी।

हमारी राष्ट्रभाषा की पावन गंगा में देशी और विदेशी सभी प्रकार के शब्द मिलजुलकर एक हो जायेंगे। - डॉ. राजेन्द्र प्रसाद।

नागरी की वर्णमाला है विशुद्ध महान, सरल सुन्दर सीखने में सुगम अति सुखदान। - मिश्रबंधु।

साहित्य ही हमारा जीवन है। - डॉ. भगवानदास।

मनुष्य सदा अपनी भातृभाषा में ही विचार करता है। - मुकुन्दस्वरूप वर्मा।

बिना भाषा की जाति नहीं शोभा पाती है। और देश की मार्यादा भी घट जाती है। - माधव शुक्ल।

हिंदी और उर्दू एक ही भाषा के दो रूप हैं और दोनों रूपों में बहुत साहित्य है। - अंबिका प्रसाद वाजपेयी।

हम हिन्दी वालों के हृदय में किसी सम्प्रदाय या किसी भाषा से रंचमात्र भी ईर्ष्या, द्वेष या घृणा नहीं है। - शिवपूजन सहाय।

भारत के विभिन्न प्रदेशों के बीच हिन्दी प्रचार द्वारा एकता स्थापित करने वाले सच्चे भारत बंधु हैं। - अरविंद।

राष्ट्रीय एकता के लिये हमें प्रांतीयता की भावना त्यागकर सभी प्रांतीय भाषाओं के लिए एक लिपि देवनागरी अपना लेनी चाहिये। - शारदाचरण मित्र (जस्टिस)।

समूचे राष्ट्र को एकताबद्ध और दृढ़ करने के लिए हिन्द भाषी जाति की एकता आवश्यक है। - रामविलास शर्मा।

हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनने के हेतु हुए अनुष्ठान को मैं संस्कृति का राजसूय यज्ञ समझता हूँ। - आचार्य क्षितिमोहन सेन।

हिन्दी का भविष्य उज्ज्वल है, इसमें कोई संदेह नहीं। - अनंत गोपाल शेवड़े।

अरबी लिपि भारतीय लिपि होने योग्य नहीं। - सैयदअली बिलग्रामी।

हिन्दी को ही राजभाषा का आसन देना चाहिए। - शचींद्रनाथ बख्शी।

अंतरप्रांतीय व्यवहार में हमें हिन्दी का प्रयोग तुरंत शुरू कर देना चाहिए। - र. रा. दिवाकर।

हिन्दी का शासकीय प्रशासकीय क्षेत्रों से प्रचार न किया गया तो भविष्य अंधकारमय हो सकता है। - विनयमोहन शर्मा।

अंग्रेजी इस देश के लिए अभिशाप है, यह हर साल हमारे सामने प्रकट होता है, फिर भी उसे हम पूतना न मानकर चामुण्डमर्दिनी दुर्गा मान रहे हैं। - अवनींद्र कुमार विद्यालंकार।

हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने में प्रांतीय भाषाओं को हानि नहीं वरन् लाभ होगा। - अनंतशयनम् आयंगार।

संस्कृत के अपरिमित कोश से हिन्दी शब्दों की सब कठिनाइयाँ सरलता से हल कर लेगी। - राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन।

(अंग्रेजी ने) हमारी परम्पराएँ छिन्न-भिन्न करके, हमें जंगली बना देने का भरसक प्रयत्न किया। - अमृतलाल नागर।


हिन्दी के विकास एवं उत्थान पर लिखे विद्वानों के लेख हिन्दी विकी पुस्तक लिंक पर पढें.... निचे दिए लिंक पर जायें.....

हिन्दी विकी-पुस्तकसंग्रह: हिन्दी हितार्थ
हिन्दी विकी-पुस्तकसंग्रह: मुख्य पृष्ठ

Wednesday, October 28, 2009

शादी से पहले ‘स्वास्थ्य कुंडली’ अवश्य मिलाइए

शादी से पहले वर-वधु की कुंडली मिलने की प्रथा तो सदियों से चली आ रही है, इसके साथ ही साथ वर-वधु की स्वास्थ्य-कुंडली मिला लेना भी बेहद ही आवश्यक हो गया है, ऐसा करने से आने वाले पीढी के स्वास्थ्य को बेहतर बनाया जा सकता है| थालेसिमिया और HIV एसे रोग हैं जो की माता-पिता के द्वारा होने वाले बच्चों में फैलाते हैं और बच्चों के भविष्य पर अंकुश लगा जाते हैं| इन्हें जरूर रोका जा सकता जय यदि हमारा समाज इनके प्रति जागरुक हो!!!

थेलेसीमिया (अंग्रेज़ी:Thalassemia) बच्चों को माता-पिता से अनुवांशिकता के तौर पर मिलने वाला जन्मजात अनुवांशिक रक्त-रोग है जिसके कारण तहत शरीर में हीमोग्लोबिन निर्माण प्रक्रिया में गड़बड़ी हो जाती है। इसकी पहचान तीन माह की आयु के बाद ही होती है। इसमें रोगी बच्चे के शरीर में रक्त की भारी कमी होने लगती है, जिसके कारण उसे बार-बार बाहरी खून चढ़ाने की आवश्यकता होती है। यह दो प्रकार का होता है। यदि पैदा होने वाले बच्चे के माता-पिता दोनों के जींस में माइनर थेलेसीमिया होता है, तो बच्चे में मेजर थेलेसीमिया हो सकता है, जो काफी घातक हो सकता है।[१] किन्तु पालकों में से एक ही में माइनर थेलेसीमिया होने पर किसी बच्चे को खतरा नहीं होता। यदि माता-पिता दोनों को माइनर रोग है तब भी बच्चे को यह रोग होने के २५ प्रतिशत संभावना है।। अतः यह अत्यावश्यक है कि विवाह से पहले महिला-पुरुष दोनों अपनी जाँच करा लें।विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार भारत देश में हर वर्ष सात से दस हजार थैलीसीमिया पीडि़त बच्चों का जन्म होता है। केवल दिल्ली व राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में ही यह संख्या करीब १५०० है। भारत की कुल जनसंख्या का ३.४ प्रतिशत भाग थैलेसीमिया ग्रस्त है।[२] इंग्लैंड में केवल ३६० बच्चे इस रोग के शिकार हैं, जबकि पाकिस्तान में १ लाख और भारत में करीब 10 लाख बच्चे इस रोग से ग्रसित हैं।


थैलेसेमिया में आनुवांशिकता का ऑटोसोमल रिसेसिव पैटर्न होता है।

इस रोग का फिलहाल कोई ईलाज नहीं है। हीमोग्लोबीन दो तरह के प्रोटीन से बनता है अल्फा ग्लोबिन और बीटा ग्लोबिन। थैलीसीमिया इन प्रोटीन में ग्लोबिन निर्माण की प्रक्रिया में खराबी होने से होता है। जिसके कारण लाल रक्त कोशिकाएं तेजी से नष्ट होती है। रक्त की भारी कमी होने के कारण रोगी के शरीर में बार-बार रक्त चढ़ाना पड़ता है। रक्त की कमी से हीमोग्लोबिन नहीं बन पाता है[१] एवं बार-बार रक्त चढ़ाने के कारण रोगी के शरीर में अतिरिक्त लौह तत्व जमा होने लगता है, जो हृदय, यकृत और फेफड़ों में पहुँचकर प्राणघातक होता है।[२] मुख्यतः यह रोग दो वर्गों में बांटा गया है:

मेजर थैलेसेमिया:
यह बीमारी उन बच्चों में होने की संभावना अधिक होती है, जिनके माता-पिता दोनों के जींस में थैलीसीमिया होता है। जिसे थैलीसीमिया मेजर कहा जाता है।

थैलेसेमिया:

थैलीसीमिया माइनर उन बच्चों को होता है, जिन्हें प्रभावित जीन माता-पिता दोनों में से किसी एक से प्राप्त होता है। जहां तक बीमारी की जांच की बात है तो सूक्ष्मदर्शी यंत्र पर रक्त जांच के समय लाल रक्त कणों की संख्या में कमी और और उनके आकार में बदलाव की जांच से इस बीमारी को पकड़ा जा सकता है।

पूर्ण रक्तकण गणना (कंपलीट ब्लड काउंट) यानि सीबीसी से रक्ताल्पता या एनीमिया का पता लगाया जाता है। एक अन्य परीक्षण जिसे हीमोग्लोबिन इलैक्ट्रोफोरेसिस कहा जाता है से असामान्य हीमोग्लोबिन का पता लगता है। इसके अलावा म्यूटेशन एनालिसिस टेस्ट (एमएटी) के द्वारा एल्फा थैलीसिमिया की जांच के बारे में जाना जा सकता है। मेरूरज्जा ट्रांसप्लांट से भी इस बीमारी के उपचार में मदद मिलती है।
लक्षण

सूखता चेहरा, लगातार बीमार रहना, वजन ना ब़ढ़ना और इसी तरह के कई लक्षण बच्चों में थेलेसीमिया रोग होने पर दिखाई देते हैं।

बचाव एवं सावधानी

थेलेसीमिया पी‍डि़त के इलाज में काफी बाहरी रक्त चढ़ाने और दवाइयों की आवश्यकता होती है। इस कारण सभी इसका इलाज नहीं करवा पाते,[५] जिससे १२ से १५ वर्ष की आयु में बच्चों की मृत्य हो जाती है। सही इलाज करने पर २५ वर्ष व इससे अधिक जीने की आशा होती है। जैसे-जैसे आयु बढ़ती जाती है, रक्त की जरूरत भी बढ़ती जाती है।

* विवाह से पहले महिला-पुरुष की रक्त की जाँच कराएँ।
* गर्भावस्था के दौरान इसकी जाँच कराएँ
* रोगी की हीमोग्लोबिन ११ या १२ बनाए रखने की कोशिश करें
* समय पर दवाइयाँ लें और इलाज पूरा लें।

विवाह पूर्व जांच को प्रेरित करने हेतु एक स्वास्थ्य कुण्डली का निर्माण किया गया है, जिसे विवाह पूर्व वर-वधु को अपनी जन्म कुण्डली के साथ साथ मिलवाना चाहिये। स्वास्थ्य कुंडली में कुछ जांच की जाती है, जिससे शादी के बंधन में बंधने वाले जोड़े यह जान सकें कि उनका स्वास्थ्य एक दूसरे के अनुकूल है या नहीं। स्वास्थ्य कुंडली के तहत सबसे पहली जांच थैलीसीमिया की होगी। एचआईवी, हेपाटाइटिस बी और सी। इसके अलावा उनके रक्त की तुलना भी की जाएगी और रक्त में RH फैक्टर की भी जांच की जाएगी।

इस प्रकार के रोगियों के लिए कितनी ही संस्थायें रक्त प्रबंध कराती हैं। इसके अलावा बहुत से रक्तदान आतुर सज्जन तत्पर रहते हैं।

शोध और विकास

थैलेसीमिया पर विश्व भर में शोध अनुसंधान अन्वरत जारी हैं। इन प्रयासों से ही थैलीसीमिया पीड़ितों के लिए एक दवाई अविष्कृत हुई थी। इस दवाई से बच्चों को अब इंजेक्शन के दर्द को नहीं झेलना पड़ेगा। जल्दी ही भारतीय बाजार में ये दवा आने वाली है, जिसे खाने से ही शरीर में लौह मात्रा नियंत्रित हो जाएगी। असुरां नाम की यह दवा पश्चिमी देशों में एक्स जेड नाम से पहले से ही प्रयोग हो रही है। इससे इलाज का खर्च भी कम हो जाएगा, किंतु इसके दुष्प्रभावों (साइड एफ़ेक्ट्स) में इससे किडनी प्रभावित होने का एक परसेंट खतरा बना रहता है। दिल्ली के गंगाराम अस्पताल के थैलीसीमिया इकाई के अध्यक्ष डॉ. वीरेंद खन्ना के अनुसार[२] भारत में अतिरिक्त लौह निकालने के लिए दो तरीके प्रचलन में हैं। पहले तरीके में डेसोरॉल (इंजेक्शन) के जरिए आठ से दस घण्टे तक लौह निकाला जाता है। यह प्रक्रिया बहुत महंगी और कष्टदायक होती है। इसमें प्रयोग होने वाले एक इंजेक्शन की कीमत १६४ रुपए होती है। इस प्रक्रिया में हर साल पचास हजार से डेढ़ लाख रुपए तक खर्च आता है। दूसरी प्रक्रिया में कैलफर नामक दवा(कैप्सूल) दी जाती है। यह दवा सस्ती तो है लेकिन इसका इस्तेमाल करने वाले ३० प्रतिशत रोगियों को जोड़ों में दर्द की समस्या हो जाती है। साथ ही इनमें से एक प्रतिशत बच्चे गंभीर बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं। ऐसे में नई दवा असुरां काफ़ी लाभदायक होगी। यह दवा फलों के रस के साथ मिलाकर पिलाई जाती है और इसकी कीमत १०० रुपये प्रति डोज है।

मेरु रज्जू ट्रांस्प्लांट

थैलेसीमिया के लिये स्टेम सेल से उपचार की भी संभावनाएं हैं। इसके अलावा इस रोग के रोगियों के मेरु रज्जु (बोन मैरो) ट्रांस्प्लांट हेतु अब भारत में भी बोनमैरो डोनर रजिस्ट्री खुल गई है।[१०] मैरो डोनर रजिस्ट्री इंडिया (एम.डी.आर.आई) में बोनमैरो दान करने वालों के बारे में सभी आवश्यक जानकारियां होगी जिससे देश के ही नहीं वरन विदेश से इलाज के लिए भारत आने वाले रोगियों का भी आसानी से उपचार हो सकेगा। यह केंद्र मुंबई में स्थापित किया जाएगा। ऐसे केंद्र वर्तमान में केवल अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा जैसे देशो में ही थे। ल्यूकेमिया और थैलीसीमिया के रोगी अब बोनमैरो या स्टेम सेल प्राप्त करने के लिए इस केंद्र से संपर्क कर मेरुरज्जु दान करने वालों के बारे में जानकारी के अलावा उनके रक्त तथा लार के नमूनों की जांच रिपोर्ट की जानकारी भी ले पाएंगे। जल्दी ही इसकी शाखाएं महानगरों में भी खुलने की योजना है।

थालेसिमिया के आलावा HIV भी माता-पिता में से किसी एक यो दोनों के द्वारा होने वाले बच्चों में फैलता है| अतः यह बेहद ही जरूरी होता है की शादी से पहले दोनों जोड़े अपना-अपना स्वास्थ्य परिक्षण जरूर करावा लें, इससे आने वाले पीढी के स्वास्थ्य सुनिश्चित हो जाता है|


~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
श्रोत लेख : विकी थालेसिमिया

अन्य सम्बंधित लेख पढ़ें:
अब शादी से पहले मिलाइए ‘स्वास्थ्य कुंडली’

इंजेक्शन के बिना थैलीसीमिया से लड़ेंगे बच्चे


Monday, October 12, 2009

मतदान करना हमारी नैतिक जिमेद्दारी है या महज एक औपचारिकता?

http://static.josh18.com/pix/labs/sitepix/12_2008/0412vote248.jpg http://static.josh18.com/pix/labs/sitepix/11_2008/vott248.jpg http://1.bp.blogspot.com/_N_3WPk4E4zA/SeFTLeCU93I/AAAAAAAAABI/e6bIJz6wxcY/s200/DELelection-logo-1_1238992421_m.jpg

महाराष्ट्र विधानसभा का चुनाव कल दिनांक १३ अक्टूबर २००९ को होना है, जनता को फिर एक बार अपने मताधिकार का उपयोग कर सरकार गठन करने का जिम्मा मिला है| अब सोचने योग्य बात यह है की कौन है जो जनता के आशाओं और जरूरतों को पूरा कर सकने में सक्षम होगा! किस आधार पर किसी उम्मीदवार को अपना वोट देकर उसकी जीत को करना चाहिए? क्या किसी एक पार्टी विशेष को ध्यान में रख कर उसी पार्टी के उम्मीद वर को वोट दें, या फिर उम्मीदवार की योग्यता, कर्मठता एवं साफ सुथरी छवि को तवज्जो देना चाहिए चाहे वो किसी भी पार्टी विशेष का हो या फिर कोई निर्दलीय ही क्यों न हो! क्या हमने और आपने कभी अपने क्षेत्र के उम्मीदवारों के बारे में जानना चाह की कौन कितना योग्य है? मतदान करना हमारी नैतिक जिमेद्दारी है या महज एक औपचारिकता?

किन मुद्दों को ध्यान में रख कर आप अपनें मताधिकार का उपयोग करेंगे? क्षेत्रवाद, भाषावाद, धर्मवाद, जातिवाद या फिर अपने क्षेत्र के विकास, रोजगार, आर्थिक तंगी, सुरक्षा और सुख शांति को ध्यान में रखना सही होगा? सोचिये, चिंतन करिए की हम क्या चाहते है, और हम जो हम चाहते हैं वो हमें कौन दिला सकता है?

महाराष्ट्र विधान सभा चुनाव के मद्देनज़र किसी पार्टी नें या किसी उम्मीदवार नें आपको विकास का वादा किया या फिर आपके भावनाओं को भड़का कर आपसे क्षेत्रवाद, भाषावाद, धर्मवाद, जातिवाद के आधार पर आपसे अपने लिए मत माँगा? आप सोचिये आप के लिए कौन से मुद्दे जरूरी हैं, और उसी आधार पर अपनें मताधिकार का सदुपयोग करें!!!

खुद जाकर मतदान करें तथा औरों को भी प्रेरित करें!!!

जय हिंद! जय हाराष्ट्र!!
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
~~~~

There can be no daily democracy without daily citizenship.
-Ralph Nader

नागरिकता के दैनिक व्यवहार के बिना लोकतंत्र का दैनिक निर्वाह हो ही नहीं सकता|
-राल्फ़ नेडर

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

"When nobody around you seems to measure up, it's time to check your yardstick."
-Bill Lemley

"आप के आसपास के लोगों में से कोई भी जब आप के मानदंडों पर खरा न उतरे तो मान लीजिए कि अपने मानदंडों को फिर से परख लेने का समय आ गया है| "
-बिल लेमली

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

"You can close your eyes to reality but not to memories."
-Stanislaw Lec

"आप वास्तविकता से अपनी आंखे मूंद सकते हैं, मगर स्मृतियों से नहीं| "
-स्तानिस्ला लैक

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

"Good thoughts bear good fruit, bad thoughts bear bad fruit. "
-James Allen

"सुविचरों से सुफल उपजते हैं और कुविचारों से कुफल|" -जेम्स एलन

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

"Ninety-nine percent of all failures come from people who have the habit of making excuses."
-George Washington Carver

"असफल व्यक्तियों में से निन्यानवे प्रतिशत वे लोग होते हैं जिन की आदत बहाने बनाने की होती है| " -जॉर्ज वाशिंगटन कार्वर

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

"The way I see it, if you want the rainbow, you gotta put up with the rain. "
-Dolly Parton

"मेरा दृष्टिकोण तो यह है कि आप इंद्रधनुष चाहते हैं तो आप को वर्षा सहन करनी ही होगी| "
-डॉली पार्टन

Tuesday, September 29, 2009

विजयादशमी के दिन एक महिला ने आतंकी को ढेर किया...

विजयादशमी के दिन दुर्गा माता का रूप धर एक मुस्लिम महिला ने अपने घर में जबरन घुस आए लस्कर के आतंकवादी को अपनी साहस एवं सजगता का परिचय देते हुए कुल्हाडी से वार कर मौत के घाट उतार दिया| दशहरे के अवसर पर, जिसे अधर्म पर धर्म की विजय के स्वरूप जाना जाता है, एक रावण रूपी आतंकी का खात्मा, दुर्गा स्वरूपी एक घरेलु महिला के हाथों होना अपने आप में इस दिन की महिमा को चरितार्थ कर देता है|

बी.बी.सी न्यूज़ पर छपी ख़बर:

रूखसाना को अब अपनी जान का भी ख़तरा है.

जम्मू-कश्मीर के राजौरी ज़िले के काल्सी गाँव में 18 वर्षीय लड़की रुख़साना कौसर ने अद्भुत साहस दिखाते हुए एक चरमपंथी को ढेर कर दिया और दो अन्य को ज़ख्मी कर दिया. बीबीसी से बात करते हुए रूखसाना ने पूरी घटना को इन शब्दों में बयान किया.

"रात को लगभग नौ बजे मेरे दरवाज़े को ज़ोर-ज़ोर से पीटने की आवाज़ें आने लगी. हम लोगों ने दरवाज़ा नहीं खोला. लेकिन जब हमें लगा कि दरवाज़ा तोड़ दिया जाएगा तो मेरे माँ-बाप ने मुझे चारपाई के नीचे छुप जाने के लिए कहा और उन्होंने दरवाज़ा खोल दिया.

हथियार से लैस तीन लोग घर में घुस आए जबकि चार अन्य बाहर दरवाज़े पर ही रह गए. उन्होंने बिना कुछ कहे मेरे माँ-बाप को पीटना शुरू कर दिया. उन्होंने अम्माँ-अब्बा को इस बुरी तरह से पीटा कि वह ज़मीन पर गिर गए.

हम लोगों ने इस इलाक़े में बहुत दिनों से किसी दहशतगर्द को नहीं देखा था... वे इस इलाक़े में लगभग 11 साल बाद आए थे.

मुझसे अपने माँ-बाप की हालत देखी नहीं गई इसलिए मैंने सोचा कि मरने से पहले मुझे बहादुरी के साथ उनका मुक़ाबला करना चाहिए. मेरे माँ-बाप बुरी तरह चीख़ रहे थे और वे लोग उनका मुंह बंद करने के लिए कोई कपड़ा तलाश कर रहे थे.

मैं चारपाई के नीचे से निकल कर बाहर आ गई.

तभी एक दहशतगर्द के बाल मेरे हाथों में आ गए और मैंने ज़ोर से पकड़ कर उसे दीवार से टक्कर दे दी जिससे वह गिर पड़ा और फिर मैंने कुल्हाड़ी से उसपर वार कर दिया जो उसकी गर्दन पर लगा।

जान को ख़तरा

एक दूसरे दहशतगर्द पर कुल्हाड़ी चलाई जो उसके चेहरे पर लगी। किसी तरह मैंने एक आदमी की राइफ़ल छीन ली और बिना रुके गोली चलाती रही। बाद में देखा गया कि उस दहशतगर्द कमांडर के जिस्म पर 12 गोलियाँ लगी थीं।

बकौल रुख़साना "हमने टीवी पर फ़िल्मों में हीरो को बंदूक़ चलाते देखा था और मैं उसी तरह गोली चलाती रही. किसी तरह मुझ में हिम्मत आ गई थी. मैं उस वक़्त तक गोली चलाती रही जबतक कि मैं थक के चूर नहीं हो गई."

उसी बीच एक दहशतगर्द ने गोली चलाई जो मेरे चाचा के बाज़ू को ज़ख्मी करती हुई निकल गई. उसी दौरान मेरे भाई ने भी एक आतंकवादी की राइफ़ल छीन ली और उसने भी गोली चलानी शुरू कर दी थी.

उनसे हमारी लड़ाई काफ़ी देर चलती रही. इससे पहले मैंने कभी राइफ़ल को हाथ भी नहीं लगाया था उसे चलाना तो दूर की बात थी.

लेकिन हमने टीवी पर फ़िल्मों में हीरो को बंदूक़ चलाते देखा था और मैं उसी तरह गोली चलाती रही. किसी तरह मुझ में हिम्मत आ गई थी. मैं उस वक़्त तक गोली चलाती रही जब तक कि मैं थक के चूर नहीं हो गई.

उन्होंने मेरी माँ से सिर्फ़ मेरा नाम पूछा था.

ये चरमपंथी रूखसाना की गोली का शिकार बना.

इस लड़ाई में दो और दहशतगर्द ज़ख़्मी हुए, उनके चहरे पर कुल्हाड़ी के वार के साथ मुझे लगता है कि गोली भी लगी थी. मेरे हिसाब से उसका ज़िंदा बचना मुश्किल है.

ऐसा लगता है कि अल्लाह ने मुझे इस मुसीबत की घड़ी में इतनी हिम्मत दी कि मैं उन दहशतगर्दों का मुक़ाबला कर पाई. लेकिन मुझे डर है कि वे लोग इस घटना के बाद मुझे नहीं छोड़ेंगे. ये उनके लिए बड़ी शर्म की बात है कि उनका एक कमांडर इस लड़ाई में मारा गया.

हालांकि पुलिस ने मेरे घर के पास एक पिकेट बना दिया है और उन्होंने पूरी सुरक्षा का यक़ीन भी दिलाया है लेकिन अब हमारा इस गांव में रहना मुश्किल है. उन्हें चाहिए कि हमें राजौरी के शहर या किसी दूसरी महफ़ूज़ जगह भेज दें.

(बीबीसी संवाददाता बीनू जोशी के साथ बात-चीत पर आधारित)

सौजन्य : http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2009/09/090929_rukhsana_story_mb.shtml

Monday, September 28, 2009

आप सभी को विजयादशमी की ढेरों शुभकामना !!!



Happy Dussehra Comments  Image - 1


http://media4.dropshots.com/photos/272174/20081001/195517.jpg

http://i213.photobucket.com/albums/cc78/myscrado/fst/hdus_018.gif



jalate_07.jpg image by myscrado


अधर्म पर धर्म के विजय,
असत्य पर सत्य के विजय,
के इस पावन अवसर पर,

आप सभी को विजयादशमी की ढेरों शुभकामना !!!

Saturday, September 26, 2009

क्या भारत वास्तविकता में एक धर्मनिरपेक्ष एवं लोकतंत्र देश बन पाया है?

भारतीय सभ्यता कई-कई हज़ार वर्ष पुरानी है, प्राचीनतम काल से ही संसार के दुसरे कोनों से जाने कितनी ही सभ्यता भ्रमण करते हुए भारत वर्ष में आईं और यहाँ की आबो-हवा में रच बस गईं और यहीं की हो गईं| भारतीय संस्कृति कुछ इसी ही प्रकार से फलती फूलती रही है| ईतिहासकारों के मान्यतानुसार कई हज़ार वर्ष पहले आर्य कहीं पश्चिम से भारतीय धारा पर आए और यहाँ के मूल निवासी द्रविड़ को दक्षिण भारत में खदेड़ कर उत्तरी भारत में बस गए और भारतीय संस्कृति में नया आयाम स्थापित किया|

इसी तरह कई जातियाँ-प्रजातियाँ यहाँ आती और यहीं रचती-बसती गई| फिर मुगल आए यहाँ के शासकों को युद्ध में पराजित कर भारतवर्ष में अपना साम्राज्य फैला लिया, कुछ सौ उनका साम्राज्य भारत वर्ष पर चला, उनकी संस्कृति यहाँ की संस्कृति में घुल मिल गयी, ऊर्दू भाषा इसी सांस्कृतिक मिलन की ऊपज है| फिर अंग्रेज आए व्यापर करते करते भारत देश को गुलाम बना कर शासन कराने लगे और अपनी अंग्रेजियत यहाँ की संस्कृति में घोलने लगे|

फिर अंग्रेजों की चंगुल से हिंदुस्तान की आज़ादी का दौर शुरू हुआ, लगभग एक पुरी सदी भले ही लग गई, आज़ादी का ये जूनून रंग लाया और अंग्रेजी तानाशाही को भारतवर्ष से पलायन करने पर विवस कर दिया| आज़ादी के उस जंग में हिस्सा लेने वाला हरएक क्रन्तिकारी सभी धर्म और मजहब से कहीं ऊपर हिन्दुस्तानी सिर्फ़ हिन्दुस्तानी ही रहा होगा| ऐसी एकजुटता, ऐसी सामंजस्यता , ऐसी दीवानगी एवं जूनून ऐसा देशप्रेम भारतीय संस्कृति ने शायद पहली बार ही देखी होगी! उस द्दौर में एक ही धर्म रहा होगा और वह यकीनन भारतीयता ही रही होगी....

परन्तु जिस आज़ादी की जूनून नें भिन्न-भिन्न धर्म एवं साम्प्रदाय के लोगों को भारतीयता के एक ही रंग में रंग दिया था, जूनून पुरा होते ही, आज़ादी मिलते ही भारतीय जनमानस के ह्रदय में बहने वाला वह रंग कुछ यूँ फीका पड़ा की आजादी के ६ दसक बीत जाने के बाद भी बेरंग ही बना हुआ है| दुनिया का अपने आप में एकलौता राष्ट्र जो धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देता है, साम्प्रदायीकता एवं धार्मिक कट्टरवाद के चंगुल में ऐसा जकड गया है की सदियों बाद भी न छुट सके| परंती ऐसा नहीं है की सभी धर्मान्धता के चंगुल में फंसे हुए है, आज के दौर में जहाँ एक जमात कट्टर्वादों की है तो वहीं उदारनीति के समर्थकों की भी कमीं नहीं है| परंती कट्टरपंथी चाहे वे किसिस्भी धर्म या मजहब के हों वे उदारपंथ के मानाने वालों पर कहीं न कहीं भरी पड़ ही जाते हैं जिसके परिणाम स्वरूप साम्प्रदायीक वैमनस्व सर उठाने लगता है और समय समय पर देश की संप्रभुता को आघात पहुंचाते रहता है|

आप मेसे कुछ यह सोच रहे होंगे की अरे १५ अगस्त या २६ जनवरी तो बीत चुका है, फिर इस चिठ्ठाकार को क्या हो गया है जो असमय ही भारतीय अस्मिता की दुहाई रटे जा रहा है!!! तो जनाब ये सब अकारण ही नहीं है, और हमारी यही मानसिकता कि केवल १५ अगस्त या २६ जनवरी या एसे ही कुछ एक ख़ास अवसर पर ही देश प्रेम की चर्चा करना उचित होगा हमें जकडे रखा है और हमारी आज़ादी नाम मात्र ही रह गई है|

अच्छा तो मैं बताता हुं कि मुझे असमय यह सारी बातें क्यों करनी पड़ रही है.... Google Groups के "Hindi Bhasha" group में मैंने नवरात्र एवं ईद कि बधाई हेतु हिन्दी भाषा ग्रुप के मित्रों को -मेल लिखा जिस पर एक सज्जन को आपत्ति हुई और उन्होंने अपनी अभिव्यक्ति कर विरोध जताया, जिसका पुरा वाक्य निचे ऊद्धृत कर रहा हूँ...

मैंने निम्नलिखित बधाई संदेश भेजा...
सेDinesh R Saroj
कोhindibhasha@googlegroups.com
दिनांक२१ सितम्बर २००९ ९:०४ AM
विषय"नवरात्र की ढेरों शुभकामनाएँ" एवं "ईद मुबारक हो!!!"



हर दुआ कुबूल हो आपकी,
हर तमन्ना साकार हो,
महफिलों सी रहे रोशन जिंदगी,
कभी न जीवन में वीरानी हो,
हमारे तरफ से आप सभी को

"नवरात्र की ढेरों शुभकामनाएँ"
एवं
"ईद मुबारक हो!!!"

------------------------------
With Best Regards,
Dinesh Saroj
Desktop इंजिनियर
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

जिस पर मोहन भाया जी कि निम्नालिखी प्रतिक्रिया आयी...

से mohan bhaya
को उत्तर देंhindibhasha@googlegroups.com
दिनांक२३ सितम्बर २००९ ११:०९ PM
विषय[Hindi Bhasha] Re: "नवरात्र की ढेरों शुभकामनाएँ" एवं "ईद मुबारक हो!!!"



Navratra ki shubhkamnaye to theak hai per doosari....? kyon? jabki 15 august aur 26 janwari ko unki bherh itni nahi hoti jitna veh log tajmahal aur roads per karte hai,,,,? iska kya matlab hua yeh samajh ke bahar hai? sath hi ve log hamare kisi tyohar ki shubhkamnayen publicaly nahi dete....? sochiye.....varna jo log polio drops/ parivar niojan / nagrikta ke bare me ghambhir nahi hai aur din dooni rat chogni apni sankhaya bada rahe hai aur yahi raftar rahi to bahut jaldi veh hi dikhenge bharat me hum nahi rahenge....jaisa kuch din pahale indian mujahiddin ne hamare news papers me vigaypti prakashit karvai ki 5 sal me bharat se hindoon ka naan nishan mita denge॥? kahan hai hamari bhartiyata ki bhavna....nagrikta ki bhavna..? ya gulami aur maska parast hi hamari pahachan ban gai hai....?
-eak bhartiya nagrik
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

जिससे मेरे उदारवादिता को आहत पहुँचा और मैंने उन्हें अपनी प्रतिक्रिया ईस प्रकार दर्ज किया.....

से Dinesh R Saroj
कोhindibhasha@googlegroups.com
दिनांक२५ सितम्बर २००९ १०:३३ AM
विषयRe: [Hindi Bhasha] Re: "नवरात्र की ढेरों शुभकामनाएँ" एवं "ईद मुबारक हो!!!"



प्रिय मोहनजी,

आपकी वतनपरस्ती एवं उससे जुडी चिंता के लिये आपको सलाम!!!

आपकी चिंता एवं उसके उपलक्ष्य में आपने जो ताजमहल एवं सडकों पर भीड़ वाली बात कही है मैं भी उससे इत्तेफाक रखता हूँ| परन्तु १५ अगस्त एवं २६ जनवरी में इकठ्ठे भीड़ में से आप किसी हिन्दू, मुस्लिम या किसी ईसाई को पृथक कैसे कर पायेंगे? क्या ऐसा कोई चस्मा है? क्या कहीं भीड़ के आंकड़े निर्दिष्ट किये हुए है? या हम बस ऐसा मान लेते है और अपने मन में अवधारणा बना लेते है|

जब आप ताजमहल एवं सडकों पर भीड़ वाली बात करते हैं, तब शायद आप यह भूल जाते है या यूँ कहे की नजरअंदाज कर देते है की उससे कहीं कहीं ज्यादा भीड़ मुंबई एवं अन्य जगहों पर गणेश पंडालों में गणेश जी के दर्शन के लिए उमड़ती है तथा चतुर्दशी के दिन गणेश विसर्जन करने आये श्रध्हलुओं की होती है, जिसे संभालना प्रशासन के लोगों के लिए सिरदर्द बन जाता है| मुंबई के जन्माष्टमी को भी शायद आप भूल गए जिसमे इस बार swine flu के संक्रमण के भय के बावजूद भी भारी भीड़ उमड़ पड़ी थी| एसे और भी कई उधाहरण मैं प्रस्तुत कर सकता हूँ जैसे कुम्भ का मेला ईत्यादी| क्या आपने कभी क्रिकेट मैच में जुटे भीड़ को उनके जाती-धर्म के आधार पर आंकने की कोशिश की है?

आज भारत देश एक धर्म निरपेक्ष देश के रूप में अपनी संप्रभुता बना चुका है.... और भारतीय संविधान ने सभी धर्मों को उनकी संप्रभुता और स्वतंत्रता बनाये रखने का पुर-पूरा अधिकार दिया है|
और इसपर न ही आप ना ही मैं और ना ही कोई और प्रश्न उठा सकता है|

और रही "इंडियन मुजाहिद्दीन" के ५ सालों में हिन्दुओं का नामों निशां मिटाने की तो उसके लिए आप निश्चिंत रहें.... ऐसी कोशिशे सदियों से होती आ रही हैं पर सदा ही नाकाम भी होती रही हैं!!! भारतीय संस्कृति इतनी उदार और परिपक्कव है की यह सभी को अपने में समाहित कर लेती है!!!

कोई भी जागरूक माता-पिता अपने बच्चों को पोलियो टिका से वांच्छित नहीं रखेंगे .... और यदि कोई रखता है तो मैं समझता हूँ वे नासमझ हैं, उन्हें जागरुक बनाने की जरुरत है| इसे धर्म-जाती के आधार से देखना मुझे तर्क सांगत लगता है| और यदि कोई धार्मिक गुरु पोलियो टिका न देने की सलाह या फतवा देता है तो मैं इसे धर्मान्धता और अज्ञानता ही कहूँगा|

परिवारनियोजन एक गंभीर मुद्दा है, जिस तरह जनसँख्या विस्फोट हो रहा है यह निकट भविष्य के लिए बहुत ही बड़ी समस्या बनता जा रहा है| पर मैं फिर कहना चाहूँगा इस विषय को भी एक रंग के चश्मे से न देखें| आपको केवल मुस्लिम परिवार ही नहीं अपितु हर धर्म के परिवार मिल जायेंगे जो बच्चों को ईश्वर का रूप कहते हैं और परिवार नियोजन के नाम से कन्नी काटते हैं| मैंने एक हिन्दू धर्मगुरु (किसी का नाम नहीं लेना चाहूँगा) के पुस्तक में उन्हें यह सन्देश देते पाया है की भारत देश में हिन्दुओं की संख्या बढाइये सरकार के परिवार नियोजन को तवज्जो न दें? इसके बारे में आप क्या कहेंगे??? मैं तो इसे धर्मान्धता ही कहूँगा फिर चाहे कोई भी धर्म गुरु ऐसा क्यों न कहे|

रही भारतीय नागरिकता की बात, तो भाईजी, तो जो मुस्लिम खुद को भारतीय या हिन्दुस्तानी कहलाना पसंद नहीं करते थे (या जैसी भी परिस्थिति रही हो) १९४७ में ही भारत छोड़ चले गए थे| और जो देश छोड़ कर नहीं गए यहीं रह गए आप उन्हें देशप्रेमी कहने के बजाय उन्हें एक विशेष रंग के चश्में से देख रहे हैं!!! यह कहाँ तक तर्कसंगत है??? आप यह भूल जाते हैं की मुस्लिमों के आलावा कुछ गैर मुस्लिम (हिन्दू, सिख एवं अन्य) १९४७ में भारत नहीं आये थे और जहां थे वहीँ बसे रहे, उन्हें अपनी जन्मभूमि से प्रेम था चाहे अब वह अखंड भारत देश का हिस्सा न रहा हो| उनका मैं सम्मान करता हूँ| और जो मुस्लिम यहाँ रह गए हैं उनका भी सम्मान करता हूँ|

कृपया हमारे राजनीतिज्ञों एवं तथाकथित कट्टरपंथीयों की तरह अखंड भारत देश को जाती-धर्म के चश्में से मत देखें| कम से कम मैं इतना कह ही सकता हुं की मेरे जितने भी गैर हिन्दू मित्र या जानने वाले लोग हैं वे मुझे हर हिंन्दु धार्मिक त्योहारों की शुभकामना के साथ साथ स्वतंत्रता दिवस एवं गणतंत्र दिवस की बधाई देते है| और मैं इसी पर विश्वास करता हुं| और तो और कुछ तो मेरे साथ मंदिरों में आकर प्रार्थना करने में जरा भी संकोच नहीं करते| और मैं स्वयं भी दरगाहों, मजारों, गिरिजाघरों में उसी श्रध्दा से जाता हूँ जैसे की मंदिरों में|

मैं सर्वधर्म समभाव में यकीन रखता हूँ, और हर धर्म को सामान रूप से आदर भी देता हूँ| और मेरा सभी महानुभावों से निवेदन है की मानव धर्म को सभी जाती-धर्मों से सर्वोपरि समझे| वैस हर इंसान अपनी विचारधारा के लिए स्वतंत्र है| सुनी-सुनाई बातों में कितना सत्य है या कितनी छलावा यह मैं नहीं कह सकता| hindibhasha Group पर भी गैर हिन्दू मित्र हिन्दू त्योहर्रों की बधाई देते रहे हैं यह तो आपने भी देखा होगा|

अंत में मैं यह भी कहना चाहूँगा की बिना आग के धुआं नहीं निकलता, कुछ चंद मुठ्ठी भर एसे लोग भी यकीनन हैं जो भारत देश की संप्रभुता को क्षति पहुँचाने में जुटे हुए हैं और लगातार प्रयास करते रह रहे हैं, जिस कारण हमें अक्सर कई आतंकवादी हमलों एवं सांप्रदायिक तनाव का सामना करना पड जाता है| परन्तु किसी परिवार के रसोई घर के चूल्हे में लगी आग से निकले धुएँ को किसी आतंकी हमले में हुए विस्फोटों का धुंआ समझ लेना कितना तर्कसंगत है???

मैं किसी के भावना को आघात पहुँचाना नहीं चाहता, और यदि जाने अनजाने ऐसा कुछ हुआ हो तो क्षमा प्रार्थी हुं!!!

रहीमन धागा प्रेम का,
मत तोड़ो चटाकाई|
टूटे से फिर ना जुड़े,
जुड़े गाँठ परि जाई||


जय हिंद !!!

------------------------------
With Best Regards,
Dinesh Saroj
Desktop Engineer
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

मेरे इस प्रतिक्रिया पर कुछेक महानुभव का समर्थन संदेश भी आया, यहाँ तक कि जयराम "विप्लव" जी ने अपने चिठ्ठा में इस पुरे वाकये को कुछ इस प्रकार उल्लेखित किया..... "Hindi bhasha google group" में चल रहे विवाद से सबक लेना चाहिए ब्लॉग जगत को |
~~~~~~~~~~~````````````````~~~~~~~~~~~~~~~~~"::::::::::::~~~~~~~~~~~~~~~

आज के लिए इतना ही काफी नहीं था कि इसीसे मिलाता जुलता एक और संदेश हिन्दी भाषा ग्रुप पर प्रसारित हुआ.... जो इस प्रकार है

से(swamee shree ji ) swamee shree
दिनांक२३ सितम्बर २००९ ५:५४ PM
विषय[Hindi Bhasha] vichaar karen -yah kitana uchit hai-swamee shree ji (swamee shree paramchetanaa nandji )

Subject: : Prayer or show of force

नमाज या शक्ति प्रदर्शन
दिल्ली गुडगाँव एक्सप्रेस वे एन .एच 8 पर मुसलमानों द्वारा पढ़ी गई नमाज के सन्दर्भ में आज (22-09-2009) के विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित समाचार व फोटो देखकर एहसास हुआ कि मुस्लिम समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग या यूँ कहें कि पूरा मुस्लिम समाज कट्टरवाद का शिकार हो रहा है l आज से कुछ वर्ष पूर्व गली मुहल्लों की मस्जिदों में पढ़ी जाने वाली नमाज अब सडको , मुख्या मार्गो में पढ़ी जा रही है .

आखिर इससे क्या साबित किया जा रहा है ?
कही यह हिंदुस्तान में तालिबान की संरचना का एक अंग तो नहीं ?
हिन्दुओ के धार्मिक आयोजनों के लिए प्रशासनिक अनुमति की अनिवार्यता , इनके लिए कोई कानून नहीं ?

ये सब होता रहा और प्रशासन मूक बनकर देखता रहा .

हिंदुस्तान को पाकिस्तान , साउदी अरब बनने से रोकने के लिए हमे ऐसे आयोजनों (कट्टरता) का विरोध करना होगा अन्यथा वह समय दूर नहीं जब रोज नमाज के समय हमे अपने घरो में ही रहना पड़ेगा .

www.rashtrawadisena.org


कृपया देश हित में इस सन्देश को अधिक से अधिक लोगो तक भेजे.

संलग्न - टाईम्स ऑफ़ इंडिया एवं दैनिक जागरण में प्रकाशित समाचार।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
जिस पर मेरी प्रतिक्रिया इस प्रकार रही....

सेDinesh R सरोज
कोhindibhasha@googlegroups.com
दिनांक२५ सितम्बर २००९ ११:०४ PM
विषयRe: [Hindi Bhasha] vichaar karen -yah kitana uchit hai-swamee shree ji (swamee shree paramchetanaa nandji )

आज सुबह की शुरुआत एक कट्टरवादी को समझाने की कोशिश से हुई, और अब दिन का समापन भी उसी अंदाज में करना पड़ रहा है, पर मैं उदार भारतीय संस्किति को नमन करता हूँ...

मुस्लिमों नें रेलगाडी में नमाज़ क्या पढ़ लिया, साम्प्रदायीक मुद्दा बन समाचार पत्रों की एवं चिठ्ठाजगत की सुर्खियाँ बन बैठीं... क्या अपने ईश्वर की स्तुति करना जेहाद कहलाता है.....

क्या कभी किसी पत्रकार नें नवरात्रि, दशहरा, दीपावली के दौरान कभी भी रेलगाडी में सफर नहीं किया....? यकीनन नहीं ही किया होगा.... शायद इसीलिए हिन्दू यात्रियों द्बारा रेलगाडी में हिन्दू धार्मिक त्यौहार जोर-शोर एवं हर्षोल्हास के साथ मनाने की खबर भी किसी न किसी अखबार में जरूर छपती..... पत्रकारिता की ऐसी व्यवसायीकरण एवं तथाकथित कट्टरवाद ने ही भारतवर्ष को साम्प्रदायीक तनावों में उलझाए रखा है!!!

बस अब और ज्यादा नहीं लिखा सकता.... निन्द्रासन में जाना भी जरूरी हो रहा है....

------------------------------
With Best Regards,
Dinesh Saroj
Desktop Engineer
------------------------------

मैं हर उस कट्टरपंथी धर्मावलम्बी का विरोध करता हूँ जो महज अपने मजहब को बढ़ा-चढा कर प्रस्तुत करने की होड़ में अन्य धर्मों को निचा दिखने की हद तक पहुँच जाता है| फ़िर चाहे वो अल्लाह तालाह का अनुयायी हो, शिव-विष्णु का पुजारी या ईसामसीह का समर्थक गुरुनानक का शिष्य या चाहे बुद्ध दार्शनिक....

अब क्या सही है क्या ग़लत इसका मापदंड कौन निर्धारित करेगा???? और उसकी योग्यता एवं विश्वश्नियता कौन निर्धारित करेगा ???


भीष्मपितामह एवं महात्मा गांधीजी समेत अन्य शहीदों नें यह कभी नहीं सोचा होगा कि जिस भारतवर्ष के लिए उन्होंने अपना सर्वस्व त्याग दिया, न्योछावर कर दिया उसकी ऐसी दयनीय आवस्था होगी!!!

अंत में कबीर साहेब के कुछ दोहे कहना चाहुँगा -

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा ना मिल्या कोय,
जो मन खोजा आपना, तो मुझसे बुरा ना कोय
|

पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ, पंडित भयो न कोय,
ढाई आखर प्रेम का, जो पढ़े सो पंडित होय|




@ Dins'